09 अक्तूबर 2011

बोध-बिहार


               

     

     
-डॉ० डंडा लखनवी

 



क्रोध -बोध  के बीच  में, चलता  सतत विरोध।
बोध-नाश पर क्रोध हो, क्रोध-विजय पर बोध॥

तीन  बुद्ध  की  ’शरण’ हैं, पाँच  बुद्ध के ’शील’।
तीन- पाँच से दुख सभी, सुख  में  हों तब्दील॥
 
'डंडा'  बोध - बिहार के, चिंतन   का  यह सार।
वधस्थलों  पर हो सकी,’अवध’  भूमि तैयार॥

पंच - शील से  जब  घटी, पंच -  मकारी  मार।
’डंडा’  तब  संसार में, चमका  अवध - बिहार॥

स्वर्ण  अक्षरों  में  मिला,  दर्ज़ा   जिसे  विशेष।
जहाँ न  वध का नाम था, वो
था अवध  प्रदेश॥

दसो  इंद्रियों  का जहाँ, बहा  सुमति   का  नीर।
गोमति का चिर अर्थ है, इंद्रिय - निग्रह   धीर॥

’डंडा’  फैजाबाद   है, अवध  -  शब्द   अनुवाद।
अवध  हमारी   संस्कृति, वध  करता  बरबाद॥

शरण= त्रिशण, शील= पंचशील, वधस्थल= बलि देनेके स्थान, पंच-मकार= मन - विचलन के पाँच आकर्षण, सुमति= अच्छा चिंतन, गोमति=चिंतन का सार, इंद्रिय-निग्रह=इंद्रियों पर नियंत्रण, धीर= धीरज, फ़ैजाबाद= आपदा मुक्त स्थान, अवध,

16 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञान-बोद्ध वर्धक रचना जन-कलायंकारी है। हमे इसी अर्थ मे समझना चाहिए।

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  2. ’डंडा’ फैजाबाद है, अवध - शब्द अनुवाद।
    अवध हमारी संस्कृति, वध करता बरबाद॥

    अनुपम शानदार प्रस्तुति.
    ज्ञानवर्धक,प्रेरणादायक.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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  3. behtarin prastuti..sadar pranam aaur apne blog per aapke ashirwad ki akaksha ke sath

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  4. वाह वाह वाह ..

    अवध हमारी संस्कृति,
    वध करता बरबाद

    आपने तो अवध की नई परिभाषा गढ़ दी.

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  5. दीपक बाबा जी! वास्तव में करूणा से उपजी अवध की सही परिभाषा यही है। वधिकों ने इसे बिगाड़ दिया था।

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  6. वाह वाह
    ज्ञान वर्धक दोहे... सादर बधाई...

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  7. बहुत सुंदर , सलाम आपको भाई जी .....
    शुभकामनायें !

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  8. वाह बड़े भाई वाह !
    बहुत सुन्दर दोहे ....और इन सुन्दर दोहों के माध्यम से 'अवध' और अवध क्षेत्र की महिमा का निरूपण प्रशंसनीय |

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  9. ’डंडा’ फैजाबाद है, अवध - शब्द अनुवाद।
    अवध हमारी संस्कृति, वध करता बरबाद॥

    vah Danda sahab ...man gaye bhai bahut hi sundar dohe padhane ko mile....bahut gahri anubhutiyon ko samete huye ye dohe nishchay hi sangrhneey hai ....abhar ke sath hi badhai .... ap to mere padosi nikale maine bhi avadhibhasha me kuchh rachanayen likhi hain mere post pr apka swagat hai.

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  10. "क्रोध -बोध के बीच में, चलता सतत विरोध।
    बोध-नाश पर क्रोध हो, क्रोध-विजय पर बोध॥"

    आपकी कॄतियों में शब्दों का संयोजन मन मोह लेता है । अत्युत्त्म !

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  11. "क्रोध -बोध के बीच में, चलता सतत विरोध।
    बोध-नाश पर क्रोध हो, क्रोध-विजय पर बोध॥"

    आपकी रचनाओं में भाव और शब्दों का संयोजन मन मोह लेता है। रचना के नीचे शब्दों का अर्थ देकर आपने ज्ञानवर्धन का अत्यंत सराहनीय कार्य किया है । आपसे बहुत-कुछ सीखने की इच्छा है।
    अति उत्तम !

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