13 जनवरी 2026

चाय : एक राष्ट्रीय लत की आत्मकथा



✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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कभी चाय बहुत शरीफ़ हुआ करती थी। वह हर समय उपलब्ध नहीं रहती थी, न ही हर घर की सदस्य थी। बचपन में चाय मौसम देखकर आती थी—वह भी केवल जाड़ों में। गर्मियों में चाय का नाम लेना बदतमीज़ी माना जाता था। तब चाय न सर्वकालिक थी, न सर्वव्यापी और न ही सर्वशक्तिमान। आज चाय हर जगह है—बस भगवान के मंदिर में ही शेष है, वहाँ भी प्रसाद के रूप में पहुँचने की कोशिश में है।


उन दिनों एक कप चाय दस पैसे में मिल जाती थी—पूरे दस पैसे में। आज इतने में चायवाला कप भी न दिखाए। तब एक कप चाय में स्वाद भी होता था और मात्रा भी। आज उसी मात्रा से चार कप बन जाते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले चाय होती थी, अब उसका ट्रेलर चलता है। महँगाई अब चाय से नहीं, चाय पीने वालों की सहनशक्ति से मापी जाती है।


मेरी नानी बताया करती थीं कि अंग्रेज़ों के ज़माने में ‘लिपटन-टी’ वाले चौराहों पर बड़े कंटेनरों में मुफ्त चाय बाँटते थे। अंग्रेज चालाक थे—वे जानते थे कि एक बार भारतीयों को चाय की आदत लग गई, तो राज भले चला जाए, चाय का साम्राज्य नहीं जाएगा। यह इतिहास भले किताबों में न हो, पर हर कप में दर्ज है।


आज चाय पीने वाला साधारण नागरिक नहीं रहा, वह ‘टी-लवर’ हो गया है। जैसे शराब पीने वाला शराबी कहलाता है, वैसे ही दिन में पाँच बार चाय पीने वाला गर्व से खुद को टी-लवर कहता है। ‘चायाबी’ शब्द हमें देसी लगता है, इसलिए हमने अपनी लत को अंग्रेज़ी पहनाकर सामाजिक मान्यता दे दी है। आदत अब शौक नहीं, स्टेटस बन चुकी है।


पहले अतिथि के सामने पान रखा जाता था। पान न मिले तो भी संबंध चलते रहते थे। आज चाय न मिले तो संबंधों में खटास आ जाती है। पान छोड़ दिया गया, पर चाय अनिवार्य कर दी गई। कई रिश्ते तो अब केवल “चाय पर आइए” के भरोसे चल रहे हैं।


आज चाय की कीमत चाय से ज़्यादा उसके पात्र पर निर्भर करती है। चाय वही रहती है—बस कप बदलते ही रेट बदल जाते हैं।

 डिस्पोज़ल कप में सस्ती,

 मिट्टी के कुज्जे में महँगी,

 काँच में इज़्ज़तदार और

 स्टील में पूरी तरह सरकारी।

थैली में बंद चाय पीकर आदमी तय नहीं कर पाता कि उसने चाय पी है या कोई पैथोलॉजी रिपोर्ट।


डॉक्टर कहते हैं—“चाय कम पीजिए, यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” टी-लवर मुस्कराकर जवाब देता है—“डॉक्टर साहब, ज़हर नहीं है…ज़िंदगी है। बस दो घूँट और।”


सत्तर के दशक की दस पैसे वाली चाय आज तीस रुपये की हो चुकी है। चाय महँगी नहीं हुई—हम सस्ते हो गए हैं। स्वाद गया, मात्रा गई, स्वास्थ्य गया—बस आदत बची है। घर हो या दफ़्तर, बस अड्डा हो या रेलगाड़ी—“चाय गरम है!” की आवाज़ सुनते ही नींद टूट जाती है और तलब जाग उठती है।


अब चाय केवल पेय नहीं रही, वह सामाजिक मजबूरी बन चुकी है। और हम सब, जाने-अनजाने, गर्व से चायाबी बने बैठे हैं—हाथ में कप, होंठों पर मुस्कान और मन में अगली चाय की प्रतीक्षा। सच यही है कि चाय ने हमें नहीं अपनाया— हमने ही अपने विवेक का आत्मसमर्पण उसके हाथों में कर 

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सत्य और उसके समग्र आयाम


✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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सत्य वही नहीं होता जो किसी एक क्षण या एक दृष्टि से दिखाई दे जाए। वह अनुभव, स्थान, समय और दृष्टिकोण के साथ अलग- अलग रूपों में प्रकट होता है। इसी कारण सत्य को समझने के लिए समग्र दृष्टि की आवश्यकता होती है।



सन् 1970 में मैं दिल्ली गया था और वहाँ स्थित कुतुबमीनार को देखने का अवसर मिला। उस समय पर्यटकों को मीनार की पाँचवीं मंज़िल तक जाने की अनुमति थी। ऊपर पहुँचकर जो दृश्य दिखाई देता था, वह नीचे खड़े दर्शक की कल्पना से कहीं अधिक विस्तृत और भिन्न होता था। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं; कुछ दुर्घटनाओं के बाद ऊपर जाने का मार्ग बंद कर दिया गया। अब पर्यटक उस अनुभव को केवल सुन या पढ़ सकते हैं, देख नहीं सकते।



इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि एक ही वस्तु या घटना को देखने वाले सभी लोगों को एक जैसा दृश्य प्राप्त नहीं होता। जो व्यक्ति ऊँचाई पर खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न है और जो नीचे खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न। वस्तुतः एक ही समय में सभी फलक दृश्य-मान नहीं होते।



भूतकाल की घटनाएँ इतिहास बन जाती हैं। उन्हें हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते, केवल पढ़कर या सुनकर उनका अनुमान लगाते हैं। भविष्य अभी आया नहीं है, उसकी केवल कल्पना की जा सकती है। वर्तमान भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके स्थान और दृष्टिकोण के अनुसार अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। इस प्रकार दृष्टिकोण बदलने से नज़ारा बदल जाता है।



यही कारण है कि एकांगी दृष्टिकोण अपनाने से पूर्ण सत्य का बोध असंभव हो जाता है। किसी भी वस्तु, विचार या घटना को समझने के लिए उसके सभी पक्षों का समग्रता से आकलन आवश्यक होता है।



भारतीय दर्शन में इस सत्य को जैन दर्शन ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया है। जैन दर्शन में सत्य की समग्र अनुभूति को स्यादवाद से जोड़ा गया है। स्यादवाद यह स्वीकार करता है कि सत्य बहुआयामी होता है। कोई भी कथन पूर्ण रूप से तभी सत्य हो सकता है, जब उसे विभिन्न अपेक्षाओं और दृष्टिकोणों से देखा जाए। प्रत्येक कथन ‘स्यात्’— अर्थात् किसी विशेष संदर्भ में—सत्य होता है, किंतु वही अंतिम और पूर्ण सत्य नहीं होता।



जिस प्रकार कुतुबमीनार की ऊँचाई से दिखाई देने वाला दृश्य नीचे खड़े व्यक्ति को उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार सत्य भी केवल एक दृष्टि से पूर्ण रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता। अनेक दृष्टियों का समन्वय ही सत्य की वास्तविक पहचान कराता है।



अतः यह स्पष्ट है कि सत्य न तो केवल देखा जा सकता है और न ही एकांगी रूप से समझा जा सकता है। सत्य वास्तव में समग्रता का बोध है—जो अनुभव, समय, स्थान और दृष्टिकोण के संतुलित समन्वय से ही संभव हो पाता है।

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खेल की भावना बनाम कट्टरता


✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज को जोड़ने वाला एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु है। खेल मैदान वह स्थान है जहाँ भाषा, धर्म, जाति, नस्ल और राष्ट्रीय सीमाएँ गौण हो जाती हैं और मानव प्रतिभा तथा परिश्रम ही सर्वोपरि होता है। इसी कारण कहा जाता है कि खेलों का धर्म केवल खेल की भावना है।



खेल की भावना का अर्थ



खेल की भावना का आशय निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, नियमों के प्रति सम्मान, प्रतिद्वंद्वी के प्रति गरिमा और जीत–हार को सहज रूप से स्वीकार करने से है। खेल हमें अनुशासन, टीम-वर्क, सहिष्णुता और आत्मसंयम सिखाते हैं। यही मूल्य खेलों को समाज-निर्माण का सशक्त माध्यम बनाते हैं।



खेलों में कट्टरता का बढ़ता प्रवेश



दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में खेलों में धर्म, जाति और नस्ल आधारित कट्टरता का प्रवेश एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। खिलाड़ी अब कई बार अपने खेल से अधिक अपनी पहचान के कारण चर्चा में आ जाते हैं। दर्शकों के नारे, सोशल मीडिया पर टिप्पणियाँ और यहाँ तक कि चयन प्रक्रिया में पक्षपात—ये सभी खेल की मूल आत्मा को आहत करते हैं।



नस्ल और रंगभेद : इतिहास की चेतावनी



इतिहास साक्षी है कि जब खेलों में नस्ल और रंगभेद हावी हुए, तब खेल को वैश्विक अपमान का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका का रंगभेदी दौर इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जब अंतरराष्ट्रीय दबाव के बिना वहाँ खेलों में समानता की कल्पना भी संभव नहीं थी। यह अनुभव हमें सिखाता है कि खेल में भेदभाव को “आंतरिक मामला” मानकर अनदेखा करना घातक हो सकता है।



खेल समाज का दर्पण



खेल समाज का आईना होते हैं। यदि समाज में कट्टरता, असहिष्णुता और विभाजन बढ़ता है, तो उसका प्रतिबिंब खेल मैदान में भी दिखाई देता है। परंतु यही खेल समाज को सही दिशा देने का माध्यम भी बन सकते हैं। एक टीम में विभिन्न धर्मों, जातियों और नस्लों के खिलाड़ी मिलकर खेलें—यह दृश्य अपने आप में सामाजिक समरसता का संदेश देता है।



समाधान और सामूहिक जिम्मेदारी



खेलों को कट्टरता से मुक्त रखने के लिए खेल संस्थाओं, सरकारों, मीडिया और दर्शकों—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। भेदभाव के विरुद्ध सख्त नियम, नैतिक शिक्षा, संवेदनशील मीडिया कवरेज और दर्शकों का जिम्मेदार व्यवहार आवश्यक है। खिलाड़ियों को भी यह समझना होगा कि वे केवल खिलाड़ी नहीं, बल्कि समाज के प्रेरक प्रतीक हैं।



निष्कर्ष



खेलों को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए—यही उनका सार और सौंदर्य है। जब खेल मैदान भेदभाव और कट्टरता से मुक्त होता है, तभी वह मानवता के मूल मूल्यों—समानता, भाईचारे और सम्मान—को सशक्त करता है। यदि खेल हार गया, तो केवल एक मैच नहीं हारेगा, बल्कि समाज अपने भविष्य की एक उज्ज्वल संभावना खो देगा।

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✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी

 समय : घड़ी नहीं, मन का शरारती रिश्तेदार

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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समय बड़ा विचित्र प्राणी है। घड़ी में तो वह बड़ी ईमानदारी से टिक-टिक करता रहता है, पर हमारे मन में आते ही उसका चरित्र बदल जाता है। जैसे ही मनोदशा बदली, समय ने भी कपड़े बदल लिए। कभी वह कछुए की चाल चलता है, तो कभी खरगोश को भी मात दे देता है।


जब आप किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं—विशेषकर उस व्यक्ति की, जो “बस पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ” कहकर आधे घंटे बाद आता है—तब समय ऐसा सुस्त हो जाता है मानो उसे सरकारी नौकरी मिल गई हो। सेकेंड मिनट बन जाते हैं और मिनट युग में बदल जाते हैं। घड़ी की सुइयाँ मानो कहती हैं—“आज मूड नहीं है, कल चलेंगे।”



इसके ठीक उलट, जब आपको देर हो रही होती है, तब समय अचानक ओलंपिक का धावक बन जाता है। नहाने के लिए गए और बाहर निकले तो पता चला—समय आपसे आगे निकल चुका है। बस छूट चुकी है, ट्रेन आँखों से ओझल है और समय आपको पीछे खड़े होकर मुस्कुरा रहा है—“अब बताओ, कितने बजे की घड़ी पहन रखी है?”



दुख की अवस्था में समय का व्यवहार सबसे निर्दयी हो जाता है। वह न आगे बढ़ता है, न पीछे हटता है—बस वहीं खड़ा होकर आपको घूरता रहता है। लगता है मानो उसने शपथ ले ली हो कि आज वह हिलेगा ही नहीं। हर पल भारी, हर क्षण बोझिल— समय नहीं, कोई पत्थर सीने पर रखा हो ऐसा लगता है।



इसके विपरीत, प्रसन्नता के क्षणों में समय बड़ा चालाक निकलता है। आप हँसते- खेलते हैं और समय चुपचाप निकल जाता है। पता ही नहीं चलता कि कब घंटा बीत गया। तब हम कहते हैं—“अरे, समय का पता ही नहीं चला!” वास्तव में समय का पता नहीं चला, क्योंकि वह बिना बताए भाग गया।




और जब आप ऊब रहे होते हैं, तब समय की लंबाई बढ़ जाती है। पाँच मिनट की बैठक पाँच घंटे की लगती है। भाषण छोटा हो या लंबा, ऊब की अवस्था में हर सेकेंड “दीर्घकालीन योजना” बन जाता है। तब समय नहीं, धैर्य की परीक्षा चल रही होती है।



कष्ट में समय का असली चेहरा सामने आता है। वह न कटता है, न घटता है। घड़ी देखो तो वही मिनट, दोबारा देखो तो वही मिनट। ऐसा लगता है जैसे समय आपको चिढ़ाने के लिए वहीं बैठ गया हो—“क्या कर लोगे? मैं यहीं हूँ!”



अंततः निष्कर्ष बड़ा स्पष्ट है—समय वैसा नहीं होता जैसा घड़ी दिखाती है, समय वैसा होता है जैसा मन महसूस कराता है। घड़ी तो बस बहाना है; असली खेल मनोदशा का है। इसलिए अगली बार अगर समय तेज या धीमा लगे, तो घड़ी को दोष मत दीजिए— मन से पूछिए, आज उसका मूड कैसा है।

क्योंकि समय बदलना कठिन है, पर मन बदल जाए तो समय अपने 

आप बदल जाता है।

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आलू : मिट्टी से थाली तक की एक यात्रा

 

आलू : मिट्टी से थाली तक की एक यात्रा

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✍🏻 डॉ, डंडा लखनवी 

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आज हमारी रसोई में यदि कोई सब्ज़ी सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, तो वह आलू है। अमीर की थाली में भी वही आलू दमकता है और गरीब की रोटी के साथ भी वही सहारा बनता है। अकेले भी वह सम्पूर्ण है और दूसरी सब्ज़ियों के साथ मिलकर भी अपनी पहचान नहीं खोता। इसीलिए लोकजीवन ने उसे ससम्मान “सब्ज़ियों का राजा” कहा जाता है। परंतु यह राजा जन्म से राजसिंहासन पर नहीं बैठा था। इसका इतिहास उतना ही रोचक है जितना इसका स्वाद।



आलू की जन्मभूमि दक्षिण अमेरिका मानी जाती है—पेरू और बोलीविया के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र। वहाँ के आदिवासी समुदायों ने हज़ारों वर्ष पहले इस साधारण-सी दिखने वाली कंद सब्ज़ी को पहचाना, अपनाया और अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया। पहाड़ों की ठंडी मिट्टी में उगने वाला आलू वहाँ जीवन-रक्षक था—ऊर्जा भी देता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।



सोलहवीं शताब्दी में जब यूरोपीय खोजी संसार को नापने निकले, तब आलू भी जहाज़ों पर सवार होकर नए महाद्वीपों की ओर चल पड़ा। स्पेन के रास्ते वह यूरोप पहुँचा, पर प्रारंभ में उसे संदेह की दृष्टि से देखा गया। ज़मीन के नीचे पैदा होने वाली इस चीज़ को कई लोग अशुभ मानते थे। कुछ ने तो इसे बीमारी का कारण तक समझ लिया। पर समय के साथ आलू ने अपने गुणों से सभी शंकाओं को पराजित कर दिया। धीरे-धीरे वह यूरोप की थाली में स्थायी अतिथि बन गया।



भारत में आलू के आगमन का श्रेय प्रायः पुर्तगाली व्यापारियों को दिया जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में वे इसे अपने साथ लेकर आए। आरंभ में आलू शाही रसोई और अंग्रेज़ अफसरों की मेज़ तक सीमित रहा, पर भारतीय मिट्टी ने इसे तुरंत अपना लिया। गंगा–यमुना के मैदान हों या दक्कन का पठार—आलू हर जगह सहजता से उग आया।



भारतीय समाज में आलू का इतिहास केवल खेती का इतिहास नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता की कथा भी है। जाति, वर्ग और क्षेत्र की सीमाएँ तोड़ते हुए आलू हर रसोई में प्रवेश कर गया। व्रत में भी आलू चलता है, साधु की झोली में भी और उत्सव की थाली में भी। सब्ज़ी कम हो तो आलू काम आ जाता है, मेहमान अधिक हों तो भी वही सहारा बनता है।



आलू ने भारतीय व्यंजनों को नई पहचान दी—आलू की सब्ज़ी, दम आलू, आलू पराठा, समोसा, टिक्की और न जाने कितने रूप। उसने स्वाद के साथ-साथ पेट और बजट—तीनों का संतुलन साधा।



आज आलू केवल एक सब्ज़ी नहीं, बल्कि समय का साक्ष्य है। वह बताता है कि कैसे एक विदेशी कंद भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। मिट्टी में जन्मा, समुद्र पार से आया और थाली में नायक बन गया— देश-देशांतरों के बीच आलू की़ यात्रा मनुष्य की अनुकूलनशीलता और भोजन की सांस्कृतिक शक्ति की कहानी भी है।



इसलिए जब अगली बार रसोई में आलू हाथ में आए, तो उसे साधारण न समझिए। उसके भीतर इतिहास भी है, भूगोल भी और लोकजीवन की 

आत्मा जुड़ी है।

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11 जून 2025

लंगड़ा आम की विदेश-यात्रा

(एक हास्य-प्रधान लेख)

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-डॉ. डंडा लखनवी 

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लंगड़ा आम को आम समझना, आम की तौहीन है। उसका नाम भले ही ‘लंगड़ा’ हो, पर ठाठ-बाट में वह किसी महाराजा से कम नहीं। और जब बात उसकी विदेश यात्रा की हो, तो समझ लीजिए – ये किसी राजदूत के दौरे से कम मामला नहीं।


✈️ यात्रा की तैयारी

बनारस के एक बग़ीचे में पका-पका लंगड़ा आम अपनी डाल पर इतरा रहा था। तभी बगल के दशहरी आम ने तंज कसा —

“अबे लंगड़े, तू तो बस भारत के चाट-चौबों के लिए बना है। विदेश जाना तेरा काम नहीं।”


लंगड़ा मुस्कराया, “भैया, तुम अब भी प्लास्टिक की ट्रे में बिकते हो। मैं तो सीधे डिप्लोमैटिक कार्गो में पैक होता हूँ।”


बासमती चावल और बनारसी साड़ी को साथ लेकर, लंगड़ा आम को एक विशेष एयर कंडीशन्ड क्रेट में लपेटा गया — जैसे कोई नवविवाहित कन्या को विदेश विदा किया जाता है।


🌍 एयरपोर्ट की उठा-पटक

एयरपोर्ट पर TSA (टाइट सेक्योरिटी आम) चेक में लंगड़े की खुशबू ने हंगामा मचा दिया।


अमेरिकी कस्टम अधिकारी: “इस संदिग्ध पैकेट से मीठी-महक क्यों आ रही है?”


भारतीय अधिकारी मुस्कराया: “सर, यह लंगड़ा आम है, ये वैरस नहीं, वैरायटी है।”


🗽 न्यूयॉर्क की गलियों में लंगड़ा

न्यूयॉर्क पहुँचते ही लंगड़े को एक सुपरमार्केट की शान बना दिया गया। अल्फ़ांसो से लेकर कीसर तक सब जल-भुन गए।


एक फॉरेनर महिला ने पूछा –

“Is this really called Lung-da Mango?”

भारतीय दुकानदार बोला –

“Yes ma'am. It's not lame, it's legendary!”


🍴 अमेरिकी स्वाद, भारतीय ठाठ

पहली बार जब किसी अमेरिकी ने उसे खाया, तो बोला –

“Oh my god! This mango just punched me in the soul!”


लंगड़ा आम मन ही मन सोचने लगा –

“ये पंच तो मैंने नहीं मारा... मेरी मिठास ने किया है!”


🥭 टीवी इंटरव्यू और इंस्टाग्राम स्टार

कुछ ही दिनों में लंगड़ा आम को CNN ने बुला लिया –

“Tell us your journey from Varanasi to Vogue!”


लंगड़ा बोला –

“मैं तो यहीं का था, मगर अब देश की नाक बन गया हूँ। और जी, मुझे फिल्टर की ज़रूरत नहीं – मैं नेचुरली स्वीट हूँ।”


🇮🇳 देश वापसी का भावुक मोड़

जब विदेश मंत्रालय ने ट्वीट किया — “Proud of Langda Mango representing India globally!”

तब दशहरी आम ने मन ही मन माना –

"लंगड़ा ही सही, पर निकला इंटरनेशनल खिलाड़ी।"


🍃 उपसंहार

इस तरह, लंगड़ा आम न केवल देश की सीमाएं पार कर गया, बल्कि दिलों की सीमाएं भी पार कर गया। अब वह न केवल आम रहा, बल्कि VIP आम हो गया —

Very Indian Produce!


नोट: अगली बार जब आप कोई आम खरीदें, तो ध्यान रखें — कहीं वो विदेश यात्रा का सपना लिए बैठा लंगड़ा आम न हो! 😄

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10 जून 2025

ड्युटी पार्लर की गाइडलाइंस

✍️ डॉ. डंडा लखनवी

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नोट- जहाँ एक ओर देश की संसद में "कर्तव्य" को संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने की बहस चल रही थी, वहीं मोहल्ले के नुक्कड़ पर श्रीमती बिल्लेश्वरी देवी ने "ड्युटी पार्लर" खोल कर जनता का कर्तव्य-बोध बढ़ा दिया। अब आप सोचेंगे कि ये ड्युटी पार्लर कोई सरकारी दफ्तर जैसा होगा—न जी न! ये एक अनोखा ब्यूटी पार्लर है, जहाँ "सौंदर्य" नहीं, "कर्तव्य-बोध" निखारा जाता है। "ड्युटी पार्लर” की गाइडलाइंस एक नज़र मैं। 

1️⃣ फेस वैल्यू फेशियल

💡 चेहरा चमकाने से पहले चरित्र स्कैन

"टी-ज़ोन ठीक है, पर टाइम मैनेजमेंट डल!"

2️⃣ विचारों में हाइलाइट्स

🧠 बाल नहीं, सोच के रंग बदलिए

"कृपया बताएं, आपके विचार कितने उजले हैं?"

3️⃣ वाद-विवादिंग वैक्सिंग

🗣️ ज़ुबान की वैक्सिंग से पहले मौन मुद्रा पैक "अति बहस = एकांत ध्यान कमरा!"

4️⃣ कर्तव्य-काजल पैक

📋 हर मेकअप के साथ 'कर्तव्य पत्रक' फ्री!

☑ वृद्धा को सड़क पार कराई?

☑ पौधा लगाया?

☑ झूठ नहीं बोला?

5️⃣ दर्पण रहित सौंदर्य केंद्र

🚫 कोई शीशा नहीं, केवल “अंतरात्मा का आईना” ✨ जो कर्म से सुंदर, वही सचमुच चमकदार!

👩‍🎓 यहां सेल्फी नहीं, स्वाभिमान बनता है!

👦 बंटी बोले: “अब झूठ नहीं बोलूंगा मम्मी!”

👵 चाची बोलीं: “सब्जीवाले को छुट्टा दिया आज!”

🎖 विशेष छूट किन्हें सुलभ:

जिन्होंने आज समाज के लिए कोई अच्छा काम किया हो —

उन्हें बिना मेकअप ही ग्लोइंग स्किन गारंटी!

🪪 ड्युटी पार्लर:

“जहां ड्युटी ही असली ब्यूटी है!”

📍पता: हर ज़मीर वाले मोहल्ले में खुला

📞 संपर्क करें: अपनी अंतरात्मा से!

📢 अगली सेवा जल्द आ रही है:

“जिम्मेदार जिम – जहां वजन नहीं, आदतें 

घटती हैं!”

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,10/06/25

गंगा-जमुनी तहज़ीब के बाजूबंद

—हास्य-प्रधान लेख

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-डॉ. डंडा लखनवी 

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गंगा-जमुनी तहज़ीब का नाम सुनते ही हमारी कल्पना में बनारस की गलियों, लखनऊ की नवाबी, और इमामबाड़े के सामने बैठी गुपचुप चाट वाली ठेली का चित्र खिंच जाता है। यह तहज़ीब वह रंगीन पटाखा है जिसमें एक ही वक्त में इबादत की आवाज़ भी गूंजती है और इधर गली के नुक्कड़ पर भांग की तरंग में डूबे पंडित जी 'रघुपति राघव' गुनगुनाते मिलते हैं।


इस तहज़ीब के बाजूबंद की बात करें तो यह कोई जेवर नहीं, बल्कि परस्पर मोहब्बत, अपनापन और अदबी ठसक से सना वो भावनात्मक धागा है, जिसे हर कोई बड़े गर्व से अपनी आस्तीन पर चिपकाए फिरता है — और कभी-कभी गर्मियों में पसीने से वो चिपक भी जाता है!


अब देखिए, हमारे मोहल्ले के सलीम चचा और मिश्रा जी, इस तहज़ीब के दो अलग-अलग किनारे हैं, लेकिन जब मोहल्ले में कोई मटन-कलेजी की दावत होती है, तो सलीम चचा मिश्रा जी से पूछते हैं —

“पंडित जी, खा लेंगे न थोड़ा... दवा समझ के।”

मिश्रा जी मुँह बनाते हुए जवाब देते हैं —

“अगर नींबू-नमक साथ हो तो धर्म भ्रष्ट नहीं होता!”

बस, यह है तहज़ीब — धर्म, पाचन और स्वाद का मिलाजुला बाजूबंद!


अब लखनऊ के नवाबों को लीजिए — एक बार नवाब साहब ने पंडित त्रिपाठी को चाय पर बुलाया। चाय में इत्र मिला था, और साथ में बर्फी भी — गुलाब जल से भिगोई हुई। पंडित जी चाय पीते ही बोले —

“नवाब साहब! ये चाय है या हवन-कुंड का तर्पण जल?”

नवाब मुस्कुरा कर बोले —

“जनाब, इसमें मुहब्बत है। थोड़ा अदब से पियो।”

पंडित जी बोले —

“अदब के साथ पीता हूँ, पर पहले नमक लेकर जीभ ज़िंदा करनी पड़ेगी!”


गंगा-जमुनी तहज़ीब का असली कमाल शादी-ब्याह में दिखता है। निकाह हो या फेरे — दोनों जगह बारात में DJ ज़रूर होता है, और DJ वाले अंकल को हमेशा “फुल वॉल्यूम में ‘मेरे रश्के कमर’ लगाओ” जैसी सर्वधर्म स्वीकार्य फरमाइश मिलती है। भले ही लड़का संस्कारी हो और लड़की शायरा — बारात में नाच कर तहज़ीब की तालीम पूरी होती है।


एक बार हमारे मुहल्ले में ईद और होली एक साथ आ गए। अब सलीम चचा ने मिश्रा जी से कहा —

“इस बार सेवइयों में भांग मिलाई है, तहज़ीब के नाम पर।”

मिश्रा जी बोले —

“तो मैं भी रंग में अबीर की जगह इत्र डाल दूं, गंगा-जमुनी खुशबू फैलेगी!”


यह तहज़ीब रेशमी नहीं, बल्कि हल्के खिचखिच वाले तौलिये की तरह होती है — कभी गले लग जाती है, कभी उलझ जाती है, लेकिन काम हर हाल में आती है।


तो भई, इस ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब के बाजूबंद’ को कस के बांधे रखिए। इसमें भले ही कभी हास्य की गांठें लगें, पर मोहब्बत की सिलाई मजबूत रहती है।


क्योंकि अंत में, चाहे गंगा से स्नान करें या जमुना में डुबकी — ताज़गी तो 'संयुक्त संस्कृति' से ही आती 

है! 😄

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10/06/25




अंधविश्वास की चटनी

✍️ डॉ. डंडा लखनवी

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जब घर में कोई चीज़ गिर जाए, तो अम्मा कहती हैं – "अरे बर्तन गिरा है, कुछ बुरा होने वाला है!" और अगर बर्तन न गिरे तो "कुछ बुरा न होने की शांति" से डर लगने लगता है।


हमारे समाज में अंधविश्वास एक ऐसी चटनी है, जो हर व्यंजन के साथ परोस दी जाती है– शादी से लेकर शवयात्रा तक। इसमें स्वाद भले न हो, पर परंपराओं का तीखा झोल ज़रूर होता है।


गली के मोड़ पर बैठा पंडित ‘चूहा काट गया’, कौआ सिर पर बैठ गया, छिपकली पीठ पर कूदने से लेकर ‘नींबू मिर्च की माला’ तक हर बात का समाधान बताता है– और वो भी डिस्काउंट में। "गुरुवार को न काटो नाखून", "शनिवार को सिर न धोओ", "कुत्ता काटने पर कुकरैल नाला में डुबकी लगाओ", "काली बिल्ली रास्ता काटे तो उल्टा घूम जाओ", "अगर बिल्ली बार-बार रास्ता काटे, तो बिल्ली को समझाओ कि– "मैडम, अपना टाइम टेबल थोड़ा अलग बना लें।"


हमारे पड़ोसी शर्मा जी ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे की नौकरी लगवाने के लिए ‘साढ़े तीन पंडितों’ से मुहूर्त निकलवाया था। जब मैंने पूछा आधा पंडित कौन था? तो बोले– "वो तो मोबाइल ऐप है!"


सच्ची बात है– आजकल अंधविश्वास भी डिजिटल हो गया है। यह ‘ऑनलाइन वास्तु दोष’, ‘ई-नज़र टोना’, और ‘रिल्स में टोटके’ का ज़माना है।


बड़ी बुआ ने घर के कोने-कोने में "लाल रिबन से बंधी मिर्च-नींबू की माला" टांग दी है, ताकि कोई नज़र न लगे। जबकि माला की हालत देख कर हमीं को नज़र लग गई- घर में मिर्च तो अब सब्ज़ी में भी नहीं बची।


और तो और, कुछ लोग तो अंधविश्वास को ऐसा व्यापार बना चुके हैं, जैसे टिन में बंद चटनी- "सर्टिफाइड डर"। अंधविश्वासी चटनी के व्यापारी " भूत भगाओ ताबीज़", और "ऑर्गेनिक ग्रह शांति सामग्री” भारी छूट पर बेचते हैं। टीवी पर बाबा लोग ऐसे ऐंकर बन गए हैं कि अबध ‘ब्रेकिन न्यूज़’ से ज़्यादा ‘टोटकों’ की टीआरपी है।


एक मित्र ने बताया कि उनके घर में पंखा उल्टा घूम रहा था, तो पंडित बुला लिया गया। पंडित बोले– “ब्रह्मांड में उल्टा असर हो रहा है!” मैंने चुपचाप पंखे का स्विच बदला, और ब्रह्मांड सीधा घूमने लगा।


क्या करें! हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ विज्ञान की किताबें भी आंखें फाड़फाड़ कर देखती हैं कि बाहर निकलने का सही 'मुहूर्त’ आया है या नहीं।


अंधविश्वास की चटनी के मसालों में जायका है– डर का, धोखे का, और ढोंग का। परन्तु इस चटनी को खाते-खाते हम असली ज्ञान की रोटी के स्वाद को भूलते जा रहे हैं। अब समय आ गया है कि इस चटनी को सिर्फ चुटकुलों की प्लेट में सजाया जाए, ज़िंदगी के मेन-कोर्स में नहीं।

"सोचिए, समझिए, पर विश्वास की थाली में अंध न

मक न मिलाइए!"

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स्वर्ग की जोड़ियां और धरती की जोड़ियां

(हास्य-प्रधान व्याख्यान)

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#डॉ_डंडा_लखनवी

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स्वर्ग में जोड़ियां बनती हैं, ऐसा बहुत पहले कहा गया था। लेकिन तब इंटरनेट नहीं था, कोर्ट मैरिज नहीं होती थी, और शादी के कार्ड पर “रिश्ता स्वर्ग से बना है” लिखवाने का रिवाज भी नया-नया था। अब तो लगता है कि स्वर्ग में बनी जोड़ियों ने धरती पर आकर ऐसा अभिनय किया है कि देवता भी माथा पीट रहे होंगे— “हे ब्रह्मा, ये हमने क्या रचा!”


*स्वर्ग की जोड़ियां*: 

दिव्य मेल-जोल

स्वर्ग की जोड़ियों में संवाद नहीं, टेलीपैथी होती है। वहाँ पति पत्नी को देखते ही समझ जाते हैं कि "स्वर्णपात्र में अमृत चाहिए या सोमरस।" वहाँ तर्क नहीं, तुरन्त सहमति मिलती है। “क्या तुम नारायण का ध्यान लगाना चाहोगी?” पूछने पर पत्नी मुस्कुरा कर कहती है, “हां, और तुम वंशी बजाओ, मैं नृत्य करूंगी!”


कोई गृहक्लेश नहीं, कोई रिमोट कंट्रोल की खींचतान नहीं। वहाँ के झगड़े भी ऐसे- “तुमने मेरी माला उठा ली!”

“क्षमा करें, वह माला स्वयं मेरी ओर उड़ आई!”


🌪 *धरती की जोड़ियां*: 

संवाद का युद्धक्षेत्र

धरती पर आते-आते वह दिव्यता विलोपित हो जाती है। यहाँ जोड़ियां पहले प्रेम में, फिर भ्रम में, और अंततः ईएमआई में बंधती हैं। विवाह के बाद पहली बातचीत अक्सर यूँ होती है:


पति: "आज क्या बना है?"

पत्नी: "जो मां ने सिखाया था!"

पति: "मगर मां तो कहती हैं कि तुमने कुछ सीखा ही नहीं!"

(और इस पर मां-बेटे की गुप्त यूट्यूब चर्चा प्रारंभ हो जाती है!)


यहाँ जोड़ियां “स्वर्ग से बनी” नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा लगता है मानो रेलवे रिज़र्वेशन सिस्टम ने गलती से दो अजनबियों को एक ही कूपे में डाल दिया हो — और अब ज़िंदगी भर साथ जाना है, बिना एसी के।


🌈 *स्वर्गीय प्रेम बनाम घरेलू प्रेम*

स्वर्ग में रति और कामदेव जैसे युगल मिल-जुलकर प्रेम की मिसाल बनते हैं। धरती पर प्रेम ऐसा होता है —


“मैं तुमसे प्यार करता हूँ”

“ठीक है, मगर मम्मी से पूछना पड़ेगा।”

“शादी के बाद भी?”

“हर बात में!”


धरती की जोड़ियां बजट, बर्तन और बच्चों में उलझी होती हैं। प्यार का इज़हार “तुम्हारा मोबाइल चार्ज कर दिया है” या “आज गद्दा धूप में डाल दिया था” जैसे संवादों में छिपा होता है।


🛐 *विवाह-पश्चात स्वर्ग का भ्रम*

कुछ लोग सोचते हैं कि शादी के बाद स्वर्ग मिलेगा — लेकिन उन्हें पता चलता है कि “स्वर्ग का द्वार” कहे जाने वाले सजावट वाले मंडप से जैसे ही बाहर निकले, दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।  अब जीवन में हर उत्सव “मायके कब जाना है” और “ससुराल कब आना है”- के राउंड में बदल जाता है।


🎭 जोड़ियां वही... व्यवहार अलग। स्वर्ग की जोड़ियां सिद्धान्त में महान होती हैं — संतुलन, सामंजस्य, शांति।


धरती की जोड़ियां प्रयोगशाला होती हैं — गैस, टेंशन, और टाइम-टेबल। लेकिन फिर भी धरती की जोड़ियां ही सबसे मनोरंजक होती हैं। क्योंकि जहाँ हास्य, संघर्ष और चाय के कप में डूबा प्रेम होता है — वहीं असली जीवन होता है।


वरना स्वर्ग तो शांत है… और बहुत शांत चीज़ें, थोड़ी उबाऊ भी होती हैं।


अतः साथ जिओ, हँसते रहो — चाहे स्वर्ग की जोड़ी हो या धरती की जोड़ी — क्योंकि हँसी ही जीवन का असली ‘इत्रदान’ है!

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28 अगस्त 2014

जैसी अंटी चाउमिन.....



नव  - आगंतुक सभी के,  चूम  रहे  हैं लिप्स।
जैसी   अंटी  चाउमिनवैसे  अंकल   चिप्स॥

अंडों  में  मत  कीजिए,  मुर्गों  की   पहचान!
बहुत लोग  कहते  उसे, आलू   की   संतान

कैसे   दोनों    में  बना, रहे     प्रेम  महफूज़
बीवी   नन्हीं  रसभरी,  बड़े  मियां  तरबूज़

जीवन  सारा  खा गई, बैंक लोन  की  किस्त।
ख़त्म न लेकिन हो सकीं, चाहों  की  फ़ेहरिश्त॥

गर्मी  में  बिजली  बिना, कूलर - एसी  फेल।
गरमाहट  पा निकलता, निरा बदन का तेल??

फूहड़ टिप्पणियों से शर्मशार होना पड़ेगा ?

रेलवे लाइनों के किनारे प्रात:काल शौच के लिए बैठे लोगों को देखकर एक विदेशी यात्री ने अपनी डायरी में लिखा था... 'India is a vast toilet.'| क्या उस यात्री की टिप्पणी सही है? इस रूप में देश को ले जाने वाला कौन है? क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था इसकी दोषी नही है? इतिहास बताता है कि इस देश की रक्षा का भार क्षत्रियों पर था। शेष नागरिक देश-रक्षा के दायित्व से मुक्त रहे| बार-बार विदेशी हमले हुए। आपसी वैमनस्य के कारण समस्त रियासतों द्वारा विदेशी हमलावरों का संगठित मुकाबला नहीं किया गया| परिणाम देश की गुलामी का काल बढ़ता चला गया| वैसा ही मामला सफ़ाई का है| आज भी आम भारतीयों की पाकशालाएं चमचमातीं हैं किन्तु शौंचालय में दम घुटने लगता है। दोनों स्थानों की स्वच्छता में जमीन आसमान का अंतर होता है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में सफ़ाई का काम करना एक जाति विशेष का दायित्व समझ लिया गया। सिर पर मैला ढोने की प्रथा दशकों तक आरोपित रही। गंदगी करने वाला व्यक्ति सफाई के लिए दूसरे की ओर निहारता है| सफ़ाई कर्मियों के श्रम का मूल्यांकन ऐसा नहीं हुआ कि दूसरे लोग इस पेशे की ओर आकर्षित होकर अपनाते और गर्व का अनुभव करते। स्वच्छता बुनियादी जरूरत है। गाँधी जी ने सफाई के महत्व को समझा था। उन्होने अपना शौचालय खुद साफ़ करने की पहल की थी। आजादी के साथ ही इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विद्यालयों में शौचालयों न होने की बात कही है। अनेक कार्यालयों में सफाई व्यवस्था अस्थाई है जबकि वहाँ का कार्य स्थाई प्रकृति का है। यह विडंबना है कि देश के राजनेताओं और नौकरशाहों ने सफ़ाई को जीवन का अनिवार्य विषय नहीं माना हैं। स्वच्छता चाहे शरीर की हो, घर की हो अथवा सार्वजनिक जीवन की जबतक जीवन के लिए अनिवार्य नहीं माना जाएगा। हम भारतीयों को ऐसी फूहड़ टिप्पणियों से शर्मशार होना पड़ेगा।
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आफिस में स्वीपर लगा, टमप्रेरी सरवेंट।
बदबू जो फैला रहे, वे सब....परमानेंट॥
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@ सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी

31 जनवरी 2013

महान कहलाने का अधिकारी कौन है?

आजकल पेड-न्यूज़ का क्रेज बहुत बढ़ गया है। धन देकर किसी प्रचार एजेन्सी से कोई व्यक्ति यह सेवा ले सकता है। कुछ धनवान व्यवसायिकों ने इस काम के लिए निजी मीडिया हाउस बना रखे हैं। पेड-न्यूज़ तो पेड-न्यूज़ है। इस न्यूज़ की सेवाएं लेने वाले और देने वाले आपस में एक करार से बंधे होते हैं। ऐसी ख़बरों में तथ्यों और शब्दों के प्रयोग ग्राहक के हितों को ध्यान में रख किया जाता है। प्रचारित खबर से होने वाले लाभ अथवा हानि से प्रचार-एजेंसी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है। कई बार तो इस प्रकार की खबरों की सत्यता संदिग्ध होती है। ऐसे लेखन से जुड़े लोग अपने ग्राहक को महिमा-मंडित करने में अति श्योक्ति का सहारा लेते हैं। अतिश्योक्ति के लिए एक शब्द है-’महान’। इस शब्द से वे रातो-रात साधारण मानव को असाधारण कोटि का बना देते हैं।

 प्रचार-तंत्र से बने महान लेखकों, महान कवियों, महान नेताओं, महान अभिनेताओं, महान नायकों, महान पुरुषों महान संतों से हमारा समाज भरा पड़ा है। चारों ओर महानता के खूब झंडे गड़े हैं। प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति की महानता को नापने की कसौटी क्या है? आदमी अपने गुणों से महान बनता है ... अथवा छद्म प्रचार से? क्या अखबारों में अथवा टीवी चैनलों पर बार-बार नाम प्रचारित होने से कोई इंसान महान कहलाने का अधिकारी हो जाता है? ओसामा बिन लादेन का प्रचार माध्यमों में खूब नाम उछला था... किन्तु क्या वह महान कहलाने का अधिकारी बन सका था? सही अर्थों में सभ्य समाज में महान कहलाने का अधिकारी वही है. जिसके कार्य ’बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ हों।
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बलशाली होने से कोई...........बड़ा नहीं बन जाता।
धन-दौलत से नहीं बड़प्पन का किंचित भी नाता॥ 
बड़े वही इंसान कि जो... करते सब पर उपकार हैं।
हम सब एक तरह के पंछी जग करते गुलजार हैं॥
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सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी



06 दिसंबर 2012

जब-जब झाडू...


पैरोकार ....


रोता बच्चा हंस ...



बच्चों की मुसकान में ...



पाखंडों से दोस्ती ...



बाजारवाद और हम



07 मार्च 2012

डॉ० राम निवास ‘मानव’ की क्षणिकाएं


(1)
सीमा पार से निरंतर
घुसपैठ जारी है|
‘वसुधैव कुटुम्बकम’
नीति यही तो हमारी है|
(2)
दलदल में धंसा है|
आरक्षण और तुष्टीकरण के,
दो पाटों के बीच में
भारत फंसा है|
(3)
लूट-खसोट प्रतियोगिता
कबसे यहाँ जारी है |
कल तक उन्होंने लूटा था,
अब इनकी बारी है|
(4)
देश के संसाधनों को
राजनीति के सांड चर रहे हैं|
और उनका खामियाजा
आमजन भर रहे हैं|
(5)
मेरा भारत देश
सचमुच महान है|
यहाँ भ्रष्टाचारियों के हाथ में
सत्ता की कमान है|
(6)
जो नेता बाहर से
लगते अनाड़ी हैं|
लूट-खसोट के वे
माहिर खिलाडी हैं|
(7)
वे कमीशन का कत्था
रिश्वत का चूना लगाते हैं|
इस प्रकार देश को ही
पान समझ कर खाते हैं|
(8)
देश को, जनता को,
सबको छल रहे हैं|
नेता नहीं, वे सांप है,
आस्तीनों में पल रहे हैं|
(9)
नेता जी झूठ में
ऐसे रच गए|
सच को झूठ कहकर,
साफ़ बच गए|
(10)
नेता बाहर रहे
या जेल में,
वह पारंगत है,
सत्ता के हर खेल में|
(11)
उन्होंने गांधी टोपी पहन
अन्नागीरी क्या दिखाई|
कल तक ‘दादा’ थे,
आज बने हैं ‘भाई’|
(12)
जो कई दिनों से था
अस्पताल में पड़ा हुआ|
खर्च का बिल देखते ही
भाग खड़ा हुआ|
(13)
क्या छोटे हैं,
और क्या बड़े हैं|
सभी यहाँ बिकने को
तैयार खड़े हैं|
(14)
झूठ जाने क्या-क्या
सरेआम कहता रहा|
और सिर झुका कर सच
चुपचाप सहता रहा|

अनुकृति’, 706, सेक्टर-13
हिसार (हरि०)
फोन-01662-238720