05 मई 2011

***** सच+इन डाट काम


                                                   -डॉ. डंडा लखनवी

क्रिकेट-फीवर जबसे भारत पर चढ़ने लगा है आदमी ’इन’ और ’आउट’ के चक्कर में घनचक्कर बन गया है। किसी के लिए काला धन ’आउट’ करना लोकहित है तो किसी के लिए काला धन ’इन’ करना लोकहित है। सत्ता के अन्दर और बाहर इन और आउट की रस्साकसी चल रही है। कम्प्यूटर  की भाषा में ‘इन’ इंडिया का संकेतक है। साईं बाबा जब तक चिकिसकों की निगरानी में, अस्पताल में और अपने शरीर में थे तब तक वे ’इन’ थे। अब वे अस्पताल और शरीरिक बंधन दोनों से ’आउट’ हैं। मीडिया में उनके आउट होने की कई दिनों तक जोर-शोर से चर्चा रही। जब तक वे ’इन’ रहे, आश्रम स्वर्णमय रहा। उनके आउट होते ही सोना भी आउट हो गया। शरीर त्यागने के बाद बाबा कहाँ गए जब कोई नहीं बता पा रहा...तो सोने  के विषय में कौन बता पाएगा?

अंग्रेजी भाषा में कई प्रकार के मेल हैं-यथा मेल, फीमेल, ई-मेल,  जी -मेल  आदि  आदि। हिंदी भाषा का ’मेल’ मिलावट-बोधक है। मिलावट  से चमत्कार पैदा होता  है। ’इन’ के पहले यदि ’सच’ मिलाने से अर्थ यू-टर्न ले लेता है और एक नया शब्द ’सचिन’ पैदा होता है। सच और इन का योग बड़ा अनोखा है। सचिन इंडिया में जन्मा है। सचिन इंडिया का सच है। उसके रिकार्डों को सामने रख लोग कहते हैं-’सच+इन+इंडिया’ या ’सचिन इंडिया’। इंडिया सचिनमय है और सचिन इंडियामय। सचिन भारत में कहाँ रहता है सब जानते हैं। मैं सचिन को फोन लगाता हूँ रिस्पांस मिलता है लेकिन ’सच’ को  फोन लगाता हूँ तो कोई रिस्पांस नहीं मिलता है।

कहा जाता है राजा हरिश्चन्द्र की सच से गहरी यारी थी। उससे याराना निभाने में उन्हें लोहे के चने चबाने पड़े। दर-दर की खाक़ छाननी पड़ी। शमसान घाट में टैक्स-पेई की उन्होंने अद्भुत मिसाल रखी किन्तु चरित्र पर टैक्स-चोरी का धब्बा नहीं लगने दिया। सच का रास्ता काँटों भरा है। बाद के राजाओं ने काँटों से बचने वाले जूते पहनने शुरू किए अथवा सच से मुख मोड़ बैठे इस संबंध में इतिहास कुछ बोलता नहीं। वह मौन साधे हुए है।

आधुनिक युग में राजा-रानी मतपेटी से जन्म लेने लगे हैं। अत्याधुनिक  युग में राजाओं और रानियों की जननी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन है। माँ-बाप के चरित्र का असर बच्चों पर पड़ता है। वोटिंग मशीनों  का उसकी संतानों पर क्या असर पड़ा यह व्यवहार-विज्ञान से पूछिए। इतना  ज़रूर है आधुनिक राजा-रानियों की जननी वोटिंग-मशीनों का राजा हरिश्चन्द्र से रक्त-संबंध नहीं है। इसलिए उसकी संतानों का हरिश्चन्द्र की परंपरा निभाने में रुचि नहीं है। आजादी के बाद सरकारी कार्यालयों में नारा लिखा रहता था-’सत्यमेव जयते’। अब यह नारा अपने स्थान पर नहीं दिखता है। उसके विस्थापित होने के दो कारण हैं वह मिट चुका है अथवा ’असत्यमेव जयते’ द्वारा पिट चुका है।


6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह डॉ. साहब..... बहुत बढ़िया व्यंग्य.......बधाई....
    रचनाकार पर मेरी कविता को पढ़्ने और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने के लिये धन्यवाद ....

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  2. बहुत सटीक विश्लेषण बड़े भाई ....
    सलीकेदार मीठा व्यंग्य लेख...

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  3. आपका ये व्यंग बहुत पसन्द आया. इसके लिए आपका आभार. आपके ब्लॉग पर आना सफ़ल रहा. आपको शुभकामनाएँ.

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  4. प्रिय दोस्तों! क्षमा करें.कुछ निजी कारणों से आपकी पोस्ट/सारी पोस्टों का पढने का फ़िलहाल समय नहीं हैं,क्योंकि 20 मई से मेरी तपस्या शुरू हो रही है.तब कुछ समय मिला तो आपकी पोस्ट जरुर पढूंगा.फ़िलहाल आपके पास समय हो तो नीचे भेजे लिंकों को पढ़कर मेरी विचारधारा समझने की कोशिश करें.
    दोस्तों,क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से
    श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी लगाये है.इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है.मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
    क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ.
    अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?
    यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

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  5. ’सत्यमेव जयते... आज कल इस का मतलब कुछ यु हे... जो सत्य(सच) मे मेवा खायेगा, वो ही जीता जायेगा
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति.धन्यवाद

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