07 मई 2010

अवधी हास्य के अनूठे हस्ताक्षर : बौड़म लखनवी

                                               -डॉ० गिरीश कुमार वर्मा
साहित्य में उपनाम रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। अनेक साहित्यकार अपने वास्तविक नाम की अपेक्षा उपनाम से अधिक लोकप्रिय रहे हैं। इस परंपरा में हिन्दी हास्य-कवि अटपटे उपनाम रखने में अधिक सक्रिय देखे गये हैं क्योंकि मंचीय दृष्टि से उनका अटपटा उपनाम काव्यपाठ करने के पूर्व उनके लिए आधार भूमि निर्मित करने में सहायक होता हैं। इस परंपरा की कड़ी में श्री इन्दरचन्द्र तिवारी का उपनाम ‘बौड़म लखनवी’ हास्य-लेखन से संबद्ध होने का बोध कराने वाला है। इन्होंने प्रचुर मात्रा में हास्य साहित्य की सर्जना की है। श्री तिवारी बाराबंकी जनपद में 30 मई, 1933 को स्वर्गीय कृष्णबिहारी तिवारी के परिवार में जन्मे। इनका बचपन बडे़ संघर्षों में बीता। इनके पैत्रिक गाँव में शिक्षा-दीक्षा की उचित व्यवस्था न होने के कारण होश संभालने पर  इन्हें लखनऊ शहर की ओर प्रयाण करना पड़ा। यहाँ आकर इन्होंने सतत स्वाघ्याय के बल पर हिन्दी-साहित्य में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम0ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण की। जीवकोपार्जन हेतु श्री तिवारी ने भारतीय थलसेना, पुनर्वास विभाग तथा भारतीय रेलडाक सेवा से संबद्ध रहे और अंत में भारतीय रेलडाक सेवा से सन् 1991 में अवकाश ग्रहण करने के उपरान्त साहित्य-साधना में पूर्णरूपेण रम गए।

लेखन के अतिरिक्त इन्होंने कुछ डाकूमेंट्री फिल्मों तथा नाटकों में अभिनय किया है। लखनऊ दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों में श्री तिवारी सफल संचालक भी रहे हैं। इनकी उल्लेखनीय काव्यकृति ’बौड़म बसंत‘ में हास्य-व्यंग्यपरक रचनाएं संकलित है। ‘बड़े बाबू’, ‘उल्लुओं ने नहीं पंचों ने’, ‘टेलीफोन’, ‘पड़ोसियों की दोनों फूट जायें’, ‘मँगरे मामा’, ‘भूखा भेड़िया’, ‘स्वाँग’ आदि इनके बहुचर्चित हास्य नाटक हैं। इन नाटकों में कुछ का लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारण हो चुका है। हास्य-व्यंग्य साहित्य से इतर कृतित्त्व में ‘हीरककण’ (लघुकथा), ‘जय बँगला’ (उपन्यास), ‘जब बे मौत से मिलने चले (कहानियाँ), ‘विचित्र मानव’, विचित्र जीव-जन्तु (रिपोतार्ज), ‘है प्रेम जगत में सार’ (चंदु) आदि नामक कृतियाँ इनकी बहुआयामी कारयित्री प्रतिभा की परिचायक हैं। बौडम जी ने हास्य-प्रधान बाल रचनाएं भी की हैं। इनकी रचनाएं बाल मन को स्पर्श करके मनोरंजन करने में सहायक हैं। एक बाल रचना से उद्धृत कतिपय पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-


पत्रकार   बन   कर   एक चूहा,

बिल्ली मौसी के ढ़िग  आया।

बोला-‘मौसी! कितने चूहों को

अब    तक      है          खाया?’

मौसी     बोली-    ‘वारे भैया!

मैं      तो      हूँ    सन्यासिन।

तुमको      खा       कर        मैं

हो     जाऊँगी    बनवासिन।।”’

बाल-साहित्य में कुतूहल परक हास्य की सृष्टि करने में बौड़म जी अति कुशल हैं। एक अन्य रचना में वे हँसने के तौर-तरीकों की चर्चा कर बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करते हैं। बाल मनोविज्ञान पर इनकी पकड़ प्रस्तुत उद्धणर में प्रभावशाली रूप में अभिव्यंजित हुई है-

“बच्चो! हो जाओ अब   सावधान,

बौड़म     चाचा    अब   आते   हैं।

चुपके   से    चुपकी   साध   हँसी,

हँसने    की    किस्म   बताते हैं।।

कुछ    लोग    हँसा    करते   ऐसे,

जैसे    बंदर    चिचिहाते        हैं।

कुछ    हँसते   तो    लगता   ऐसे,

जैसे    गीदड़       हुकुवाते       हैं।

तुम    अपना     थूथुन  मोड़ हँसो,

बेधड़क    हँसो,     बेजोड़     हँसो।

पर    इतना     तुमको  ध्यान रहे,

मत अपना   थूथुन तोड़   हँसो।।’’


साधारणतः लोग प्योर दूध से क्रीम निकालने का उपक्रम करते हैं परन्तु बौड़म जी इससे दो कदम आगे बढ़कर सपरेटा से क्रीम निकालने हेतु अपनी हास्यवृत्ति के कारण उद्यत दिखते हैं। इसके लिए ये वीणापाणि माँ सरस्वती जी से यह प्रार्थना करते हैं कि वह इनकी मनोकामनाएं पूर्ण कर दे। तदनुसार निम्नलिखित सवैया छंद में इनकी मनोकामनाओं की असंगति से उपजे हास्य का आस्वादन सहज रूप में किया जा सकता है-

“मन    मानस   हंस    विवेकी   बने,

सपरेटा से     क्रीम   निकाल   सकै।

इमीटेशन   की   छलना   न    छलै,

मुख मां  चुनि मोतिउ  डारि सकै।।

जी दिमाग माँ   गोबर गैस भरी,

उई दिमाग ते छंद  निकारि सकै।

माँ  दया   करि  बौड़म का वर दे,

दस-पाँच ऊ बौड़मी पालि सकै।।”


एक अन्य रचना में बौड़म जी परेशान हाल व्यक्तियों को अपने कष्ट- निवारण के लिए पत्नी की शरण में जाने की सलाह देते हैं, यहाँ कतिपय कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

“जब कोऊ न  पीर  सुनै    तुम्हरी,

तो घरैतिन का तुम ध्यावा करौ ।

महतारी - पिता तुमहीं   सब  हौ।

कहि कै मसका यूँ लगावा   करौ।

उन प्यारी व   सारी   दुलारी कहौ,

इस सारिन   सारी लै आवा करौ।

मनोकामना   पूरी   करै   के  बदे,

कनिया मा लिहे दुलरावा करौ।।”’


बौड़म जी की रचनाओं में विदेशी फैशन, ग्रामीण जीवन की विविध समस्याएं, रूढ़ियों एवं कुरीतियों, राजनीतिज्ञों की पेतरेबाजी, नौकरशाहों के गोरखधंधों आदि पर मृदुहास्य के माघ्यम से खिल्ली उड़ाई गई है। ‘हजरतगंज की चुडैल’, ‘टिलीलिली’, ‘गाँधी जी के तीन बंदर’, ’झंड़ा आरोहण’ प्रभृति इनकी ऐसी रचनाएं हैं, जो कविसम्मेलन के मंचों से खूब सुनी जाती रही हैं। इनकी मनोरंजक शब्दावली सुनते ही आज भी श्रोतागण लोटपोट होने लगते हैं। काव्य के कलात्मक सौन्दर्य के प्रति इनका विशेष आग्रह नहीं है। शब्दों के ठेठ व अनगढ़ स्वरूप को ज्यों का त्यों प्रयोग कर अपने कथ्य को प्रभावशाली बनाने में ये अति पटु हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित कहावतों और मुहावरों के प्रयोग से इनकी व्यंजना-शक्ति सबल हुई है। संप्रति अवधी हास्य आज जिस ओर मुड़ रहा है, कविवर इंदरचन्द तिवारी ‘बौडम लखनवी’ की रचनाओं को उस दिशा का ‘रपट-संकेतक’ माना जा सकता है।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी प्रेरणास्पद टिपण्णी के लिए आपका हार्दिक आभार अभिव्यक्त करती हुं,.....|

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  2. आपका ब्लॉग बेहद रोचक हैं....

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  3. आपकी लेखनी पर टिपण्णी करने में असर्थ हुं....में भला कैसे कर सकती हुं....

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