03 मई 2010

कुछ अफसर

               -डॉ० डंडा लखनवी  


उन्हें        सोना       समझते    हैं,
हमें         कांसा     समझते      हैं।


कुछ     अफसर      आफिसों    को
एक   ’जनवासा’   समझते   हैं ।।

उन्हें    फ़रियाद     निबलों       की
समझ    में      ही     नहीं     आती-

सबल    के       ‘शू‘         समझते,
घूस   की    भाषा      समझते हैं।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना है ... आजकल हमारे देश में अफसरशाही इस कदर हावी है कि सारी व्यवस्था ही तबाह हो गई है !

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  2. रोचक और स्पष्ट या कहें कि डंडा का लखनवी डंडा

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  3. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ आपकी टिपण्णी के लिए और सुन्दर शायरी के लिए! आपकी टिपण्णी के वजह से मेरे लिखने का उत्साह दुगना हो जाता है! अफ़जाही के लिए शुक्रिया! मेरे इस ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है -
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com
    बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने और आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ की जाए कम है! बधाई!

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  4. अच्छा व्यंग किया है आपने अफसरशाही व्यवस्या पर लखनवी जी।

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  5. बहुत बढ़िया रचना!
    सतसय्या के दोहरे जैसी लगी यह रचना!

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  6. मारक भाषा है आपकी डॉ साहब ! शुभकामनायें !

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