29 अप्रैल 2010

मील का पत्थर

                   -होरीलाल

मानव सभ्यता-विकास के क्रम में
समय-समय पर
आदमी ने रास्तों के किनारे
पत्थर खड़े किए,
निशान बनाए,
उसने जरूर सोंचा होगा---
लोग उधर से गुजरेंगे,
यथा जरूरत संदर्भ लेंगे,
अपनी गति-मति-नियति संवारेंगे,
स्वर्णिम भविष्य गढ़ेंगे।

रास्ते से गुज़रने वाले
राहगीरों ने उन्हें
कट्टर-कठोर-पुराना समझा
उलट दिया,
तोड़ दिया,
मिटाने का प्रयास किया।

उलटे-उखड़े-टूटे
घायल पड़े
मील के उन पत्थरों में से
किसी ने थोड़ी हिम्मत बाँधी,
साहस जुटाया,
दया भाववश
मन में पसरी ममता को
समेटते-संजोते हुए
विनम्रता पूर्वक
गुजरते राही से पूछा-
‘बेटा! आप कौन,
कहाँ से आना हुआ,
अभी जाना कितनी दूर,
और कहाँ?’

राही अवाक् था-
उसका जवाब था-
‘मैं ........
उसने अपने आगे-पीछे
ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं
निगाहें दौड़ाईं
हर तरफ देखा ..........
सब सुनसान-वीरान था,
वह सन्न था
न कोई, कुछ उसके आगे-पीछे
न ऊपर न नीचे,
कोई तो नहीं था-
जिसे वह संदर्भ करता,
बिलकुल मौन था.......
उसके अंतस में गूंजती
उसकी आवाज़- मैं .........

पता-
एशिया लाइट शिक्षा संस्थान,
86-शेखूपुरा कालोनी, अलीगंज,
लखनऊ-226022

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना है ... इंसान को खुदको पहचानने के लिए कुछ सन्दर्भ की हमेशा ज़रूरत होती है ... यदि यही न रहा तो राह से भटकना स्वाभाविक है !

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