14 अप्रैल 2010

स्वदेशी    परिंदे  के...............                   
                                -डॉ० डंडा लखनवी           
           

परिंदों      के   खैराती     पाए    हैं,   पर   हैं।
सफ़र   में     हैं    अंजाम   से    बेख़बर  हैं ॥

कल   "ईस्ट इंडिया  कंपनी"    ने  चरा  था,
अब उससे  भी  शातिर बहुत  जानवर   हैं॥

उधर   उसने   कल  -  कारखाने    हैं    खाए,
इधर   कामगारों    की   टूटी     कमर   हैं॥

सियासत   के   गहरे   समन्दर   में    देखो-                                  
गरीबों    को     चारा   बनाते   मगर    हैं॥

ठगी,     चोरी,    मक्कारी,    वादाख़िलाफ़ी,
रहे      रहबरों     में   यही   अब    हुनर  हैं?

लगी     करने   सरकारें   भी    अब   डकैती,
कि इंसाफ़ो - आईन   सभी   ताक़   पर  हैं॥

शहीदों     के    आँसू    उन्हें      खोजते   हैं,
नए युग के आशफ़ाको-बिस्मिल किधर हैं॥                    

2 टिप्‍पणियां:

  1. ठगी, चोरी, मक्कारी, वादाख़िलाफ़ी,
    रहे रहबरों में यही अब हुनर हैं?

    लगी करने सरकारें भी अब डकैती,
    कि इंसाफ़ो - आईन सभी ताक़ पर हैं॥

    शहीदों के आँसू उन्हें खोजते हैं,
    नए युग के आशफ़ाको-बिस्मिल किधर हैं॥

    ...........Bahut Sahi. Bahut khoob!

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  2. स्वदेशी परिंदों की खूब खबर ली आपने ! लखनवी जी !नमस्कार मै उषा दुर्ग में मिले थे !

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