03 अप्रैल 2010

सुरेश उजाला के पाँच मुक्तक

                                                                             (1) 
कर्ज़    अपना   चुकाते      चलो।
फ़र्ज   अपना   निभाते   चलो।।
यूँ   समय   की   शिलालेख  पर-
नाम   अपना   लिखाते   चलो।।

(2)  
शत्रु    को   पछाड़ता    रहा।
सिंह   सा    दहाड़ता    रहा।
नूतन  बदलाव    के    लिए-
क्रांति-बीज   गाड़ता   रहा।।

(3)  
 कुछ  खड़े  सवाल आज भी।
जान  को बवाल आज भी ।।
कर  रहे   स्वदेश  खोखला- 

मुल्क के  दलाल आज भी ।।


(4)
फ़न   को    भी  बेचते  हैं  वे।
मन    को   भी बेचते   हैं वे।।
पेट    की     हैं    मजबूरियाँ-
तन   को   भी  बेचते   हैं  वे
।।
(5)  
जिंदगी  अनाम  हो    गई।
हिकमत नाकाम हो गई।।
जनसत्ता    नए    दौर   में-
ठलुओं  के नाम हो गई।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ खड़े सवाल आज भी।
    जान को बवाल आज भी ।।
    कर रहे स्वदेश खोखला-
    मुल्क के दलाल आज भी nice

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  2. बढ़िया मुक्तक हैं सर जी!
    इसकी चर्चा यहाँ भी तो है-
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_03.html

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