08 मई 2010

न्याय और शान्ति विषयक गोष्ठी सम्पन्न


लखनऊ, 7, मई ‘अन्तर्राष्ट्रीय काव्य प्रशिक्षण महाविद्यालय समिति’ एवं ‘योग दर्शन आध्यात्मिक आश्रम’ के संयुक्त तत्वावधान मे ‘न्याय और शान्ति’ विषयक एक विचार-गोष्ठी एवं कवि-गोष्ठी   ई-1/2-अलीगंज हाऊसिंग स्कीम सेक्टर-बी, लखनऊ में प्रख्यात कवि नन्दकुमार मनोचा की अघ्यक्षता एवं डॉ० डंडा लखनवी के संचालन में सम्पन्न हुई। कवि-गोष्ठी का प्रारंभ श्री कुबेर सिंह यादव ने मातृवन्दना से हुआ। चर्चित गजलकार अरविन्द ’असर’ ने एकता और न्याय पर आधारित ग़ज़ल प्रस्तुत करते हुए कहा-‘आदमी इक बात ही आसमां से सीख ले, लाखों तारे हैं वहाँ पर कोई टकराता नहीं।’ न्याय और शान्ति की बात को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ ग़ज़लकार कुवंर कुसमेश ने कहा-’रात-दिन और सुबह-शाम ये उलझन क्यों है? आज सहमा हुआ प्यारा -सा ये गुलशन कयों है??’ कुडलीकार रामऔतार ‘पंकज’ ने कहा-‘पंकज करें उपाय ज्योतिमय बने अनागत। सबमें हो सद्भाव व्यक्ति में भेद करो मत।’ उत्तर प्रदेश मासिक के संपादक डॉ0 सुरेश उजाला ने वर्तमान की समस्याओं के समाधान हेतु कहा-’सभी रास्ते खुल जाएंगे अपने दीप स्वयं बन जाओ।’ विचारक श्री होरीलाल ने ज़िंदगी की उलझनों को तिरोहित करने के लिए दृष्टान्त प्रस्तुत करते हुए कहा-बहुत कोलाहल भरी है टेन जिंदगी की, जो पहुँचा मंजिले मक़सूद वही जीता।’ आचार्य आर0 एस वर्मा ने शान्ति और न्याय से अनुपूरित विचारों को रख कर कार्यक्रम को सार्थकता प्रदान की।
अगले विचारक के रूप में न्याय और शान्ति के पक्षधरों को सचेत करते हुए डॉ0 तुकाराम वर्मा ने कहा-’यह स्वयंसिद्ध है कि उपदेशक को उपदेश देने के पहले उपदेशों को अपने जीवन में पालन करना होता है और यदि उपदेशक ऐसा नहीं करता है तो उसके उपदेशों का कुछ अर्थ नहीं रह जाता है।’कार्यक्रम के सचालक डॉ0 डंडा लखनवी ने प्रासांगिक विषय पर युवा वर्ग का आवाहन किया-‘मुक्त पडे़ हैं पथ बहुतेरे चलने वाले आएं तो । निविड़ निशा में दीपक बन कर जलने वाले आएं तो।’ अंत में न्याय और शान्ति की प्रासांगिकता पर व्यापक रूप से प्रकाश डालते हुए गोष्ठी के अध्यक्ष नन्द कुमार मनोचा ने अध्यक्षीय काव्य पाठ कर कार्यक्रम का समापन किया।
अंत में कार्यक्रम की मेजबान शीला वर्मा ने सभी अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापित किया।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया रपट!
    मातृ-दिवस की बहुत-बहुत बधाई!
    ममतामयी माँ को प्रणाम!

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  2. धन्यवाद!
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    माँ के चरणों तले भू-गगन है।
    माँ के चरणों तले ही अमन है॥
    और की क्या करूँ वन्दना मैं-
    मातृवन्दन ही भगवत्‌ भजन है॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  3. जय हो महापर्व कविता अच्छी लगी.
    स्वतंत्रता दिवस की वर्षगांठ पर आपको हार्दिक बधाई.

    कुँवर कुसुमेश

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