21 अगस्त 2010

बीमा पर तीन क्षणिकाएं

(बच्चे के हाथ से उसका गुबारा छीन कर जाता हुआ बंदर --चित्र-गुगल से साभार)


   -डॉ० डंडा लखनवी



(1)
बीमा !
मरने की 

एक तयशुदा सीमा।

(2)
बीमा की रकम पाना,
लोहे के चने चबाना।


(3)
बीमा एजेन्ट,
अत्यंत चिपकू पेन्ट।



7 टिप्‍पणियां:

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  2. क्या आप चाहते हैं?
    ऽ ढ़ेर सारा धन कमाना
    ऽ आपका अपना बिजनेस
    ऽ व्यक्तिगत उन्नति।
    ऽ दूसरों की सहायता करना।
    ऽ एक यादगार ब्यक्ति बनना।
    ऽ तेजी के साथ बढ़ती दुनिया के साथ चलना।
    ऽ तनाव रहित रहना।
    आपके कमेन्टस पढ़ने में नहीं आ रहे थे। मैंने उन्हें ठीक कर दिया है। इनमें आपने जो सपने दिखाए हैं वह एजेन्ट के हित में हैं अथवा बीमा धारके हित में?
    ------------------------------------------------------
    ऊपर लिखी रचना का आधार काल्पनिक नहीं है। भुक्तभोगी बीमा धारक का अनुभव बोला है-इसमें।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  3. आदरणीय डॉ.डडा लखनवी जी
    नमस्कार !

    बीमा पर तीन क्षणिकाएं

    तीनों एक से बढ़ कर एक !
    डंडा जी के रंग अनेक !!

    हर भुक्तभोगी बीमा धारक के अनुभवों को , उनकी पीड़ा को आपने अभिव्यक्ति दी है ।

    पुनः बधाई !!

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  4. Very good writing Adarneeya Danda bhai ji,
    aapki vidwata se bahut prabhavit hoon ,kabhi kabhi aap margdarshan dengey to utsah vardhan hota rahega,
    sader,
    dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com

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  5. adarneeya sir ji,aapke sanshodhan manya hai ,kavita mey ek naya saundarya aagaya hai aapki kalam sey ,suchmuch aapney wahi kaha jo mai kahna chahta tha per kah nahi saka .Hardik aabhar,dhanyavad,kripa banaye rakhiye ,
    sader,dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com

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