27 जुलाई 2010

ओ गोमती .......................

      -डॉ० डण्डा लखनवी

ओ गोमती !
तू एक नदी ही नहीं,
उच्चतम सांस्कृतिक आगार है,
करुणा का विस्तार है,
धन्य है तेरी सुषमा, धन्य है तेरी गरिमा
और धन्य है तेरी महिमा,
धन्य है तेरा प्यार, दुलार और उपकार,
पीलीभीत के फ़लजर  ताल से
जौनपुर में गंगा-विलय तक
धन्य है कल-कल करता तेरा विस्तार,
तुझमें यति है, गति है,
कृत है, कृति है,
तेरे तट पर बहती है शीरी जुबान,
तेरे दिल में सम्मति है, सहमति है,
तेरी अनोखी है- शान।

ओ गोमती!
तू वास्तव में ‘गो-मति‘ है
तेरे आँचल में शान्ति करती है-सदैव विश्राम
तथागत के संदेश 
ज्यों-ज्यों गुंजायमान हुए
तेरे तटों पर आठो याम,
त्यो-तयों देश-देशंतर तक छट गया,
अज्ञान रूपी धना अंधकार,
करुणा का ऐसा था जगा था-उन्मेष,
बुद्धमय हो गया था,
तेरे आस-पास का सारा परिवेश,
रक्तपात

आर्यावृत से हो गया था निर्मूल,  
मनुष्य का जंगलीपन नष्ट हो गया था-समूल!
चारों ओर ‘पानातिपाता वेरमनी सिक्खापदं समादियामि’ का
होता था-तुमुल धोष!
जिसके आगे शर्मसार था-अस्त्र और शस्त्रों का मद
किसी का यहाँ नहीं किया जाता था-वध
इसलिए ही तो
तेरे आस-पास का क्षेत्र कहलाने लगा-अवध!

ओ गोमती!
तुझे अच्छी तरह ज्ञात है,
कोसल के कलाविदों की कुशलता,
तकनीकी ज्ञान में अग्रणी
दस्तकारों की सफलता,
जहाँ पर खुशहाल था हर-कास्तकार,
चरमोत्कर्ष पर था-उद्योग और व्यापार 

कोसल की राजधानी एक ऐसी विकसित थी- बस्ती,
‘श्री‘ सदैव जहाँ थी-विहंसती,
आज भी लोग उस स्थान को कहते हैं-'श्रावस्ती'
श्री और वैभव का जहाँ नहीं था-पारावार,
जानता है सारा संसार,
जहाँ पहुँचने के लिए
आज भी लाखों लोग लगाए  रहते हैं-आस
करते हुए देश-देशांतर में निवास,
तथागत ने जहाँ फैलाया था -ज्ञान का प्रकाश

महाकारुणिक की गूँजती है,
जहाँ आज भी निर्मल वाणी
अविभूत हो जाता है
जहाँ पहुँच कर हर प्राणी!

ओ गोमती!
तेरा अंदाज निराला है,
तूने ‘पाली’ को पाला है,
अवधी को ढ़ाला है,
दिल्ली के उजड़ने पर,
उर्दू को संभाला है,
सिद्धों की गाथाएं, नाथों की भावनाएं,
शायरों की शायरी,
यहीं गूंजते रहे हैं,
‘मीर’ व ‘जोश’ के कलाम,
बड़े-बड़े फनकार तुझे करते रहे हैं सलाम,
रचे जाते रहे हैं तेरे तट पर
उपन्यास पर उपन्यास,
यशपाल, भगवतीचरण और अमृतलाल
रहते थे तेरे कदमों के आस-पास।

ओ गोमती!
तेरी माटी से उपजा और दिग्दिगंत में गूंजा,
रमई काका का हास, भुशुण्ड़ि का परिहास,
श्रीनारायाण चतुर्वेदी, श्रीलाल शुक्ल तथा रामवचन वर्मा के व्यंग्य,
सुमित्राकुमारी सिन्हा, दिवाकर त्रिपाठी के गीत,
नौशाद का संगीत,
तू जानती है भली भाँति जानती है
मोतीराम शास्त्री के तर्क,
प्रेमचंद आर्य का वर्क,

ओ गोमती!
तू गवाह है
भंते प्रज्ञानंद के अभिदान की,
प्रो0 अंगने लाल के सामाजिक और सांस्कृतिक अभियान की,
डॉ० देवीसिंह अशोक के व्याख्यान दर व्याख्यान की,
जिन्होंने दिया आम आदमी को जीवन की नई धारा,
मानवतावाद का नारा,
सिखाया जीतना
जगत् को पुरुषार्थ के द्वारा,

ओ गोमती!  
तेरे बृहृत परिक्षेत्र में आज भी
परमार्थ माना जाता है पुण्य
और स्वार्थपरता सबसे बड़ा पाप,
तूने ही सिखाया अदब का पाठ,

अंधविशवास का परित्याग,
जीवन से अनुराग,
लोगों को अपना पेट भरने के पहले कहना,
कृपया पहले आप!
पहले आप!!
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. गोमती के साथ साथ लखनऊ का अंदाज़ भी बयान कर दिया...बहुत अच्छी रचना...

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  2. बहुत खूब...लखनऊ की जुबान, शाने अवध और गोमती की कल कल धारा...क्या विवरण प्रस्तुत किया है रचना के माध्यम से.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  4. बेहतरीन कविता और गोमती उपाख्यान !

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