30 जुलाई 2010

लोग जो चिकने घड़े हैं......

                                    -डॉ० डंडा लखनवी


            लोग  जो  चिकने  घड़े  हैं।
            लग  रहा  वो  ही  बड़े  हैं॥

            आप   हैं   यदि  सदाचारी-
            पंक्ति  में   पीछे   खड़े  हैं ?

            हैं  लड़ाकू   वही   सैनिक-
            जो  चुनावों   में   लड़े  हैं॥

            भूमि पर  कुछ  और ही है-
            कह रहे  कुछ  आँकड़े  हैं॥

            समस्याएं  हल  हों   कैसे-
            अक़्ल  पर  ताले पड़े  हैं॥

            भूख   से   बेहाल  जनता-
            अन्न  के   बोरे   सड़े  हैं॥
  
            गोलियाँ ऑनरकिलर  की-
            प्रेमियों    के   चीथड़े    हैं॥

            उनकी बातों  की हक़ीक़त-
            बस  सियासी  पैतड़े   हैं॥

            चाहती  बदलाव   दुनिया-
            हम  न बदलेंगे,  अड़े  हैं॥

15 टिप्‍पणियां:

  1. चाहती बदलाव दुनिया-
    हम न बदलेंगे, अड़े हैं॥
    waah bahut khoob

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  2. आपकी शुरुआती लाइनें जैसे हकीकत है , आज ईमानदार बेवकूफ कहलाता है , बेईमानों का समूह जो कहेगा वही ठीक है !

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  3. वर्तमान परिपेक्ष में सच का आइना दिखाती एक बेहतरीन रचना.

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  5. लोग जो चिकने घड़े हैं।
    लग रहा वो ही बड़े हैं॥

    बहुत ज़बरदस्त..... एकदम सटीक!

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  6. एक -एक पंक्ति सत्य के बेहद करीब ...!

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  7. बहुत सटीक...
    अच्छा लगा पढ़कर

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  8. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

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  9. भूख से बेहाल जनता-
    अन्न के बोरे सड़े हैं॥
    सटीक रचना .
    यथार्थ बयान करती

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  10. मंगलवार 3 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  11. चाहती बदलाव दुनिया-
    हम न बदलेंगे, अड़े हैं

    ना बदलेंगे ना बदलने देंगे...वाह...बेहतरीन ग़ज़ल डंडा साहब...आनंद आ गया...
    नीरज

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