-डॉ० डंडा लखनवी
आज हर तरफ अन्ना-अन्ना हो रहा है। मेरा इस शब्द से बड़ा लगाव रहा है। बचपन में अधन्ना से परिचय हुआ। पॉकेटमनी के रूप में पिता जी दिया करते थे। तबके बालक अधन्ना पा कर प्रसन्ना-प्रसन्ना रहते थे।
आगे चल कर प्रसन्ना नाम कानों में गूँजने लगा। इसमें भी अन्ना की अनुगूँज है। क्रिकेट मैच आज की तरह पहले भी होते थे किन्तु तब मैच कानों से देखे जाते थे। जैसे ही कोई विकेट चटकता लोग ताली बजा कर झूमने लगते। उनके मुख से बरबस निकल पड़ता था- वाह प्रसन्ना! वाह प्रसन्ना! । प्रसन्ना और अन्ना में विचित्र समानता है। वे क्रिकेट के विकेट चिटकाते थे और ये भष्टाचारियों के विकेट।
जंतर-मंतर को कोप-स्थल बनाने वाले अन्ना पर आजकल मीडिया का बड़ा फोकश है। वे हजार अन्ना में एक हैं। उनका अन्ना हजारे नाम वैसे ही नहीं पड़ा है। धवलता मात्र इनके वस्त्रों में नहीं, चरित्र में झलकती है। इनके पास उपवास नामक शक्तिशाली हथियार है। इसके प्रयोग करते ही प्रशासनिक हलके में सुनामी आ जाती है। अपने हथियार का परिक्षण ये प्राय: करते रहते हैं। भ्रष्ट-कुर्सी हिलाना इनका पसंदीदा शौक़ है। हमारे यहाँ राज्यपाल, सींचपाल, लेखपाल पहले से हैं। सब के सब अपने-अपने तरह से भ्रष्टाचार को उखाड़ते हैं। अब लोकपाल बिल बनने जा रहा है। कुछ लोग इस बात से खुश हैं कि बिल बनवाने का ठेका अन्ना के पास है। माना लोकपाल बिल बन गया। चरित्र के बिना फिर समस्या आएगी। दूध का धुला लोकपाल कहाँ से लाओगे और उसे बहती गंगा में हाथ धोने से कौन रोकेगा?
मनुष्य नामक जीव की पशुता दूर करने के लिए पाठशालाएं, कोतवाली, अदालतें तथा जेल हैं। पूजाघरों की देश भर में कमी नहीं है। टी०वी० चैनलों पर उपदेशकों की भरमार है। सभी बेचैन हैं आदमी को चरित्रवान बनाने में। फिर भी ढ़ाक के तीन पात। हर तरफ कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। भ्रष्टाचार का ग्राफ आसमान चढ़ा जा रहा है। पता लगाइए! कहीं जिन एजेंसियों के कंधों पर मानवीय चरित्र को सवाँरने का दायित्व है वे "ईमानदारी" की सेल कम होने कारण अपना धंधा तो नहीं बदल चुकीं हैं।
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| चित्र : गूगल से साभार |
आगे चल कर प्रसन्ना नाम कानों में गूँजने लगा। इसमें भी अन्ना की अनुगूँज है। क्रिकेट मैच आज की तरह पहले भी होते थे किन्तु तब मैच कानों से देखे जाते थे। जैसे ही कोई विकेट चटकता लोग ताली बजा कर झूमने लगते। उनके मुख से बरबस निकल पड़ता था- वाह प्रसन्ना! वाह प्रसन्ना! । प्रसन्ना और अन्ना में विचित्र समानता है। वे क्रिकेट के विकेट चिटकाते थे और ये भष्टाचारियों के विकेट।
जंतर-मंतर को कोप-स्थल बनाने वाले अन्ना पर आजकल मीडिया का बड़ा फोकश है। वे हजार अन्ना में एक हैं। उनका अन्ना हजारे नाम वैसे ही नहीं पड़ा है। धवलता मात्र इनके वस्त्रों में नहीं, चरित्र में झलकती है। इनके पास उपवास नामक शक्तिशाली हथियार है। इसके प्रयोग करते ही प्रशासनिक हलके में सुनामी आ जाती है। अपने हथियार का परिक्षण ये प्राय: करते रहते हैं। भ्रष्ट-कुर्सी हिलाना इनका पसंदीदा शौक़ है। हमारे यहाँ राज्यपाल, सींचपाल, लेखपाल पहले से हैं। सब के सब अपने-अपने तरह से भ्रष्टाचार को उखाड़ते हैं। अब लोकपाल बिल बनने जा रहा है। कुछ लोग इस बात से खुश हैं कि बिल बनवाने का ठेका अन्ना के पास है। माना लोकपाल बिल बन गया। चरित्र के बिना फिर समस्या आएगी। दूध का धुला लोकपाल कहाँ से लाओगे और उसे बहती गंगा में हाथ धोने से कौन रोकेगा?
मनुष्य नामक जीव की पशुता दूर करने













