12 जून 2010

लुटेरे आज अपने को कमेरे कह रहे हैं...............


                         --डॉ० डंडा लखनवी

     मुक्तक :

    "सुबेरे को  नकारा अब  कुबेरे कह  रहे हैं।
     उजाले में धरा क्या है अंधेरे  कह  रहे हैं।।
     हवस ऐसी महल ख़ुद को बसेरे कह रहे हैं।
     लुटेरे आज अपने  को  कमेरे  कह रहे हैं।।"
                
             

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लेखनी में बड़ी धार है डॉ साहब !शुभकामनायें !

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहब ! आपकी लिखी हुई तीसरी और चौथी पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी और मैंने आपकी लिखी हुई पंक्तियों को पोस्ट कर दिया है और अब मेरी शायरी बेहतर बन गयी है!
    बहुत बढ़िया और बिल्कुल सठिक लिखा है आपने!

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