19 जून 2010

ग़जल : बस जली है दुल्हन सोचिए........

          
              -अरविन्द कुमार ’असर’


फिल्मी धुन पर भजन सोचिए ?
कैसे     लागे   लगन   सोचिए ?


गंगा  जल   है   प्रदूषित  बहुत-
कैसे   हो   आचमन  सोचिए।।


पाँव    उठते    नहीं    बोझ  से-
आप    मेरी  थकन   सोचिए।।


सूल   की  तो  प्रकृति  है मगर-
फूल  से   भी  चुभन  सोचिए।।


और  जितने थे  सब  बच  गए-
बस  जली  है  दुल्हन सोचिए।।


             सचलभाष -9415928198
 


1 टिप्पणी:

  1. असर साहब ने छोटी बहर में बहुत असरदार ग़ज़ल कही है...उनतक मेरी दाद पहुंचा दें...आपको, उन्हें प्रस्तुत करने का, शुक्रिया...
    नीरज

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