06 जून 2010

ग़ज़ल : क्या कर गुज़र जाते हैं लोग...............

                                           
                               -रवीन्द्र कुमार ’राजेश’


हौसला करने का हो, क्या कर गुज़र जाते हैं लोग।
बात रखने के लिए हँस- हँस के मर जाते हैं लोग।।


हर    मुसीबत   में   खड़े   रहते  थे   वे  चट्टान  से,
ज़रा सी चोट से अब तो बिखर  जाते हैं लोग।।

इक जु़बाँ और उस जुबाँ की बात का कुछ था वज़न,  
किस तरह अब बात से अपनी मुकर जाते हैं लोग।।

कह   दिया  अपना  जिसे,  उसके  सदा  के  हो गए,
काम  निकला,चल दिए, ऐसे अखर जाते हैं लोग।।

सामने   सब    कुछ  हुआ  देखा मगर सब चुप रहे,
वह  इधर मारा गया  लेकिन उधर जाते हैं लोग।।

टूटता   जाता   है   जीने   का  भरम  ’राजेश’  का,
आजकल अपने ही साये तक से डर जाते हैं लोग।।

                            ’पद्मा कुटीर’
                             सी-27, सेक्टर- बी,
                             अलीगंज स्कीम, लखनऊ-226024
                             फोन: 0522-2322154

7 टिप्‍पणियां:

  1. हौसला करने का हो, क्या कर गुज़र जाते हैं लोग।
    बात रखने के लिए हँस- हँस के मर जाते हैं लोग।।

    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति है!

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  2. सामने सब कुछ हुआ देखा मगर सब चुप रहे,
    वह इधर मारा गया लेकिन उधर जाते हैं लोग।।

    तल्ख़ सच्चाई से रूबरू करवाते शेरों से सजी ये ग़ज़ल बेजोड़ है...शुक्रिया आपका इसे हम तक पहुँचाने के लिए...राजेश जी को बधाई..
    नीरज

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  3. हर मुसीबत में खड़े रहते थे वे चट्टान से,
    इस ज़रा सी चोट से अब तो बिखर जाते हैं लोग।।
    bahut achchhi lagi ghazal.doosari pankti par aapka dhyan chahoonga.

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  4. भाई प्रेम फ़र्रुखाबादी जी। आपने जो संकेत किया है
    उसके लिए आभारी हूँ। "इक" के स्थान पर "इस"
    टाइप था। मैंने उसे सुधार दिया है।
    सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी

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  5. --सुन्दर गज़ल है राजेश जी की. परन्तु कुछ भाव-भ्रन्श( काल दोष) है यथा--सबसे पहले शेर में वर्तमान की बात है, वर्तमान के लोगों की प्रशंसा की गई है----
    -"हौसला करने का हो,क्या कर गुज़र जाते हैंलोग।
    बात रखने के लिए हँस- हँस के मर जाते हैं लोग।।"

    ---जबकि आगे सभी शेरों में भूतकाल की प्रशन्सा व वर्तमान के लोगों की गिरावट की बात है।

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