01 फ़रवरी 2010

हिंदी हास्य के विशिष्‍ट  पुरोधा :    कविवर  शारदा प्रसाद ‘भुशुण्डि’
                                                          
                                    -डॉ०  गिरीश कुमार वर्मा


    हिंदी हास्य वांगमय में अपनी प्रखर छाप छोड़ने वाले लखनऊवासी साहित्यकारों में श्री शारदाप्रसाद वर्मा ‘भुशुंडि’ का नाम अग्रिम पंक्ति के रचनाकारों में लिया जाता है। उनका स्मरण आते ही आँखों के सम्मुख एक ऐसा चित्र उभरता है जो अकिंचनता से शक्ति ग्रहण करता है और जिसके चारों ओर एक सुमधुर व्यक्तित्व की सुगंध प्रवाहमान रहती है। साहित्य मर्मज्ञ उनके ज्ञान की गहराई नापने के लिए अपने-अपने मीटरों से प्रयत्न करते रहे हैं। सागर की व्यापकता और उसकी गहराई की थाह तो मनुष्य ने पा ली है परन्तु आकाश के साथ ऐसा नहीं होता। उसका आकलन तो हर दृष्टा अपनी दृष्टि और क्षमता के अनुरूप ही करता है। सबका अपनी बाहों का विस्तार है तद्नुरूप सबका अपना-अपना आकाश भी। भुशुंडि जी के संबंध में विद्वानों के अनुभव कुछ ऐसे  ही हैं।

    कद-काठी के अनुसार उनकी मुखाकृति गोल, शरीर सुडौल, रंग गेहुआँ, कद मध्यम, तथा व्यक्तित्त्व आकर्षक था। स्वभावतः वे मितभाषी थे, किन्तु जब कभी उन्हें अपना दृष्टिकोण प्रगट करने का अवसर मिलता, बडे़ नपे-तुले शब्दों में वे अपने विचार प्रकट करने से नहीं चूकते थे। उनकी अन्तर्दृष्टि अत्यन्त तीक्ष्ण थी जिसके स्पर्श से प्रत्येक वस्तुस्थिति की मार्मिकता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। वे जिस पक्ष को प्रस्तुत करना चाहते बड़ी सरलता और रसात्मकता से व्यक्त कर देते थे। अपने अवकाश ग्रहण करने पर हुई विदाई समारोह की एक घटना के संबंध में उन्होंने बताया था कि कार्यालय के एक साथी ने जब उनसे कहा कि अब तो आपके दर्शन लखनऊ में न हो पाएंगे क्योंकि आप अपने गृह जनपद इलाहाबाद चले जाएंगे। इस पर उनका उत्तर था -‘‘लखनऊ की संस्कृति, सभ्यता में अब मैं पूरी तरह से रम गया हूँ इसे छोड़ कर अब कही और नहीं जा सकता।’’ अपने वक्तव्य की पुष्टि में निम्नलिखित रचना सुना कर उन्होंने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

    ‘‘अब लखनऊ न छ्वाड़ा जाई।
     छ्वाड़त-छ्वाड़त घिसी जवानी खला बुढ़ापा आई।।
     चमक-दमक लखि हमरे पुर की इन्द्रहु रहे सिहाई।
     कह ‘भुशुंडि’ यमराज  पुरी का जाय हमार बलाई।।’’

    यद्यपि हास्य कवि के रूप में उन्हें अधिक ख्याति प्राप्त हुई तद्यपि उनका इतर विधाओं में लेखन प्रचुर मात्रा में है। उनके कृतित्व में अध्ययनशीलता, बहुश्रुतता, सरलता, सरसता की व्याप्ति सर्वत्र विद्यमान मिलती है। उनकी साहित्य-सर्जना पर दिए गए एक अनुशंसा-पत्र में डा0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने लिखा है-‘‘मैंने कविवर शारदा प्रसाद भुशुंडि की अनेक कृतियों का अध्ययन और आस्वादन किया है। वे हास्य और व्यंग्य के तो सिद्ध कवि हैं ही, उन्होंने गम्भीर और स्थायी महत्त्व का भी काव्य-प्रणयन किया है। भुशुंडि जी ने वर्षों के दुस्साध्य परिश्रम द्वारा श्रीमद्वाल्मीकिय रामायण का जो पद्यानुवाद किया है, वह सर्वथा विशिष्ट और असाधारण है।’’ अपने समकालीन हास्य-व्यंग्यकारों के संबंध में जब मैंने कुछ जानना चाहा तो सर्व श्री बलभद्रप्रसाद दीक्षित ‘पढीस’, अमृतलाल नागर, चन्द्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका‘, भगवतीप्रसाद द्विवेदी ‘करुणेश’ आदि साहित्यकारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश भी डाला। इससे उनकी समकालीन रचनाकारों के प्रति सहृदयता परिचय प्राप्त होता है। मैंने उनसे प्रश्न किया कि जब अनेक रचनाकार अवधी-भाषा में हास्य लेखन कर रहे थे उस समय आपने खड़ी बोली का आश्रय क्यों लिया? उनका उत्तर था -‘‘आजादी के बाद भाषा आंचलिकता की सीमाओं से निकल कर राष्‍ट्रीय क्षितिज पर विस्तार पा रही थी। ऐसे में हास्य के माध्यम से हिन्दी को देश व्यापी बनाने में खड़ी बोली सर्वाघिक उपयुक्त थी।’’ वस्तुतः खड़ी बोली में उल्लेखनीय कार्य कर के उन्होंने अपनी अलग पहचान स्थापित थी। कवि गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में उनकी हास्य फुलझड़ियों तथा खट्टी-मीठी व्यंग्य बटियों पर प्रायः रसज्ञ श्रोता लोट-पोट हो जाते थे। उनका व्यंग्य लेखन लोकमंगल की भावना से अभिप्रेरित है। इस प्रकार उनका जब कभी विसंगति, विकृति, विडम्बना आदि से साक्षात्कार होता अपनी बेबाक लेखनी चलाने से नहीं चूकते। सन् 1952 में फैशनपरस्ती को लक्ष्य कर लिखी गई उनकी कुंडलिया आज भी कितनी प्रासांगिक है-

‘‘भाई   फैशन  ने यहाँ, खूब  अड़ाई टाँग।
पति  तो मुछमुंडे  हुये, पत्नी भरे न  माँग।।
पत्नी भरे न  माँग, फिरै  बन क्वारी-क्वांरा।
सूखी किसमिस एक, एक है सड़ा छुहारा।।
कह भुशुंडि  भन्नाय, बात अटपट बन आई।
नर-मादा में भेद, नहीं मिलता  कुछ भाई।।’’

    सातवें-आठवें दशक में पंजाब में प्रथकतावादियों द्वारा चलाये जा रहे हिंसक आन्दोलनों में सैकड़ों निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। समाचार पत्रों में तत्संबंधित खबरों को पढ़ कर कवि की आत्मा का तड़प उठना स्वाभाविक था। अतः कवि ने वक्रोक्ति का आश्रय ले कर उक्त विषय पर सिरफिरे लोगों  की कुंडलिया छंद के माध्यम से इस प्रकार ख़बर ली है-

‘‘यही  खबर उड़ती  हुई,  पहुँच  गयी  आकाश।
काली  जी   के   हो गये, भक्त  अकाली  खास।।
भक्त   अकाली   खास, दिव्य  नर  मेघ  रचाते।
मानव  सर    को  काट,   भेंट  में उन्हें  चढ़ाते।।
कह  भुशुंडि   भन्नाय, मार्ग  यह  बड़ा निराला।
इससे  मिलती ख्याति, पुण्य मिलता  है आला।।’’

    वर्तमान काल में सामाजिक-जीवन मूल्यहीनता से अभिशप्त है। राजनीति जनसेवा की अपेक्षाकृत एक व्यवसाय बन कर रह गई है। नेतागण अपने स्वार्थों को सिद्ध करने में अधिक सक्रिय दिखते हैं। आम जनता के कष्ट निवारण में उनकी अभिरुचि प्रायः न के बराबर होती है। फिर भी दिखावा ऐसा किया जाता है कि उनके जैसा  जनता की सेवा करने वाला संसार दुर्लभ है। ऐसे व्यक्तियों को उन्होंने अपने अंतःचक्षुओं से पहचाना और उनके मुखौटे को नोंचकर उनका वास्तविकता चेहरा जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इस दृष्टि से उनकी निम्नलिखित कुंडलिया कितनी प्रभावी है-

‘‘नेता दर्शक - वृन्द ने,   उर  में  भर  संताप।
गाँधी  जी के  नाम का, जपा अनोखा  जाप।।
जपा  अनोखा  जाप,  बाद  में भाषण  चमके।
धुवाँधार   आदर्श   बहुत,  फूलों  के   गमके।।
कह   भुशुंडि गड़  गये, शर्म से  पटु  अभिनेता।
उन लोगों से अधिक, कुशल अब लगते नेता।।’’

    आधुनिक युग में उपभोक्तावादी संस्कृति की जड़ें जैसे-जैसे जमती जा रही हैं, वैसे-वैसे व्यक्ति सामाजिक दायित्वों से विमुख होता जा रहा है। अपनी सुख-सुविधा की फ़िक्र में वह व्यक्तिवादी बन गया है। पैसे से वह सब कुछ ख़रीद लेने में विश्वास करने लगा है। मानवीय मूल्य और भावनाओं का उसके समक्ष कोई अर्थ नहीं होता। वह अर्थ को ही सर्वोपरि समझ कर ‘उपयोग करो और फेंक दो’ की नीति अमल में लाता है। भुशुंडि जी समाज में व्याप्त इस आचरण का उपहास बड़ी मार्मिकता से करते हैं, यथा-

‘‘पैसा   जग  में  सार  है,  पैसा  है  संसार।
 पैसे  के  सब  यार हैं,  पैसा   है   सरदार।।
 पैसा  है   सरदार,   काम   पैसे  से  होता।
 पैसा  बिना प्रणाम, न  करते  पोती-पोता।।
 कह  भुशुंडि भन्नाय, समझ  में  आता ऐसा।
 पैसा ही  भगवान, स्वर्ग  का  दाता  पैसा।।’’

    आधुनिक शिक्षा की दशा किसी से छिपी हुई नहीं है। उसका स्तर दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है। इससे  छात्र-छात्राओं के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होना असंभव -सा है। कवि इस स्थिति से अत्यन्त व्यथित है। अतः उसकी अभिव्यंजना तीक्ष्ण-व्यंग्य में प्रस्फुटित हुई है। यथा-

‘‘अब   बच्चों  के  कोर्स  भी, ऐसे  हैं  श्रीमान।
ज्यों  चूहों की पीठ पर,  हैं गणेश   भगवान।।
जिसे  देख  कर गारजियन, बा  देते हैं खीस।
होटल के बिल सी हुई, अब  पढ़ने की  फीस।।
लड़के   तो  स्कूल    में,  छीला   करते घास।
उनको  ट्यूटर चाहिए, घर  में बारह  मास।।’’

    कभी बाढ़ तो कभी सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदी सहते हुए आम आदमी को दो जून की रोटी जुटाना एक ओर दुष्कर है, वहीं कुछ लोग वंचितों की विवशता का लाभ उठा कर अपनी तिजोरियाँ भरते रहते हैं। इसके अतिरिक्त प्रभावकारी अंकुश न होने के कारण राजस्व को लोग निजी पूंजी समझ कर मनमाना उपयोग  करते हैं। इस असंगति को देख कर कवि का मन क्षोभ से भर उठता है। परिणाम स्वरूप उसका आक्रोश अधोलिखित दोहे में फूटा है-

 ‘‘चूहा  मैत्री-अर्दली,   अधिकारी  सरकार।
   ये  दुबले  पड़ते  नहीं,  सूखा  पड़े हजार।।’’

        एक समय था जब ‘अतिथि देवो भव’ का भाव लोगों के हृदय में विद्यमान रहता था। आज परिस्थितियाँ बदल गयी हैं। अब जिस घर में अतिथि आकर कुछ दिन ठहर जाता है, उस घर में सारा बजट गड़बड़ा जाता है। अतएव अथितियों से किनारा कर लेने में ही लोग अपनी भलाई समझने लगेे हैं। कभी-कभी न चाहते हुए भी मेहमान गले पड़ जाते हैं। वर्तमान युग में मेज़बान की इस मानवीय दुर्बलता पर कवि की परिहासिक टिप्पणी निम्नलिखित दोहे में उल्लिखित है-

               ‘‘महंगाई  की  मौज  की,  ऐसी गजब   उडान।
                     सिर के  खिचड़ी  बाल से, खलते हैं  मेहमान।।’’

    युवा अवस्था जैसे-जैसे ढ़लती जाती है वैसे-वैसे इंसान के सिर के बाल सफेद होने लगते हैं। यद्यपि ऐसे सफेद बालों की उसे कामना नहीं होती तद्यपि उन्हें नोंच कर फेंक भी नहीं पाता। विपन्नता की दशा में घर पर यदि मेहमान आ जाते हैं तो मेजबान की स्थिति भी कुछ वैसी ही होती है।इसी प्रकार अनेकानेक समसामयिक विषयों पर चुटीले व्यंग्यों से उनके सामर्थ्य का परिचय हमें प्राप्त होता है। राशनिंग के दौर में राशन-कार्ड की महत्ता को दर्शाने वाला अधोलिखित दोहा कितना मार्मिक है-

‘‘आज  अन्नदाता तुम्हीं,  तुम्हीं  हमारे लार्ड।
  बारम्बार  प्रणाम है, तुम्हें  राशनिंग  कार्ड।।’’  
  
    भुशुण्डि जी अप्रस्तुत में प्रस्तुत की उपस्थिति दर्शाने में बड़े पटु हैं। बीमार होने पर व्यक्ति स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त करना चाहता है। भले ही उसके लिए उसे इन्जेक्शन लगवाना पड़े। भुशुंड़ि जी इन्जेक्शन के कष्ट में प्रसन्नता अहसास करते है। इस भाव-दशा के चित्रण में वाग्वैद्ग्ध्य द्वारा अनुपम हास्य उद्भूत हुआ है-

‘‘सुई  भोंकती  जिस  जगह, पकड़  प्रेम  से हाथ।
  अगुन-शगुन सुख उस समय, मिले एक ही साथ।।’‘

    इस प्रकार भुशुंडि जी के दोहे साहित्य की एक प्रशंसनीय उपलब्धि माने जा सकते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘भुशुंडि दोहावली’ में अफसरशाही, आँखों का आपरेशन, वृद्धापन, प्याज की पकौड़ी, फैशन, आजादी की देन, समाजवाद, शिक्षा, प्रगतिवाद, पशु कविसम्मेलन, अंडा महात्म, विधाता की मूर्खता, पार्क प्रशंसा, मूंगफली, गड़बड़झाला आदि अनेकानेक विषयों पर दोहे संग्रहीत हैं। इन दोहों में व्यंग्य-विनोद से परिपूर्ण व्यंजना सर्वथा अपूर्व है। भुशुंडि जी के कृतित्व का प्रत्यक्षीकरण करते हुए डा0 दुर्गाशंकर मिश्र की टिप्पणी है-‘‘मैंने भुशुंडि जी की शैली का नाम विदुष शैली दिया है। भुशुंडि जी के व्यंग्य और हास्य को पढ़ा-लिखा शिष्ट समाज ही हृदयांगम कर सकता है। यह उनकी विशिष्टता भी है और लोक-प्रियता में बाधक भी है। अंग्रेजी शब्द ज्ञान से शून्य उनके हास्य का आनन्द नहीं ले सकता है।’’ वे प्रसंगानुकूल आधुनिक प्रतीकों, बिम्बों एवं उपमानों के प्रयोग से अपनी अभिव्यक्ति को अनुपम विभूति बना देते हैं। उनकी रचनाओं में कल्पना की अनुपम चमत्कृति ध्वनित हुई है। वे अपने मनोभावों को प्रकट करने के लिए कोई न कोई विनोदमय मार्ग खोज ही लेते हैं। उन्होंने कुछ साहित्यकारों की छवियों के हास्यमय शब्द-चित्र भी उकेरे हैं। प्रख्यात् रचनाकार श्रीनारायण चतुर्वेदी का कवि ने बड़ा ही सजीव और यथार्थ चित्र उकेरा है-

‘‘गोरे  से   पतले  -  दुबले  पर, हिन्दी   में    हैं   गामा।
 प्यारी,  रिस्टवाच से ज्यादा, जिन्हें सायकिल  श्यामा।।
अपटूडेट   ब्रिटिश  माडेल   पर  रोली   तिलक   लगाते।
एक   साथ  पंडित-मिस्टर  का   जो   हैं नियम निभाते।।
अपनों   से   खुलकर   मिलते    बाकी    से   तो मौन हैं।
जो  ‘बियान की   सड़क’  सुनाते   बाबूजी   ये कौन  हैं?’’

         जैसी आंग्ल-साहित्य मे पैरौडी लेखन की बडी सबृद्ध परंपरा रही है, वैसी परंपरा हिन्दी में अभी विकसित नहीं हो पाई है। अतः हिन्दी में पैरोडी साहित्य का अभाव आज भी है। भुशुंडि जी ने इस प्रविधि का महत्त्व समझा और इसे आगे बढ़ाने में पहल की। उन्होंने अनेक सिद्ध-प्रसिद्ध लेखकों एवं कवियों की रचनाओं पर उत्कृष्ट पैरोडियाँ लिखी हैं। इन पैरोडियों में आधुनिक जीवन की विद्रूपताओं, विसंगतियों, विडम्बनाओं तथा कटु यथार्थ का कच्चा चिट्ठा मिलता है। आज के नौजवानों के समक्ष रोजगार प्राप्त करने की समस्या अत्यन्त जटिल है। वह नौकरी प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की जुगत-जुगाड़ लगाता है। कवि ने इस गम्भीर समस्या को समझा और महाकवि सूरदास का ‘प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो’ की पैरोडी रचकर आज के युवा-वर्ग की दीन-हीन दशा का परिचय प्रस्तुत किया है-

    ‘‘मोरे साहब अवगुन चित न धरौ।
          वैसे ही सरविस दै डारौ, इन्टरव्यू न करौ।।’’

    कविवर भुशुंडि जी की ब्याजोक्तियों में पाठकों की अंतःचेतना को अन्दोलित कर देने वाली चमत्कृति व्याप्त है। वे अपनी रचनाओं में विडम्बनाओं का चित्रण कुछ इस गाम्भीर्य के साथ करते हैं कि जिसे सुनकर अथवा पढ़कर समझदार व्यक्ति के मन में स्वतः तर्क-वितर्क उत्पन्न हो जाता है। उनकी रचनाओं का आस्वादन करते समय सहसा मानसिक झटका लगता है और व्यक्ति सोचने-समझने के लिए बाध्य हो जाता है कि क्या यह उचित और क्या अनुचित है? उनके व्यंग्य का वास्तविक आशय से पाठक अवगत हो जाता है। वस्तुतः व्यंग्यकार की वक्रोक्तियाँ यथार्थ को विखंडित रूप में प्रस्तुत करती हैं। भुशुंडि की रचनाओं में व्यक्त विडम्बनाओं को चाँदी की वर्कों से सजी प्लेट में परोसा हुआ लाल मिर्चों का हलवा कहना किंचित् भी अतिशयोक्ति न होगा। उदाहरणार्थ, आजकल के मंचीय कवियों एवं कवयित्रियों की रचनाओं में व्याप्त लिजलिजेपन पर आक्षेप करती हुई उनकी अधेलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

‘‘जिसने गा कर गीत सुनाये, उसको मेरा धन्यवाद है।
अल्हड   स्वर ने मेरे दिल को,
दिया  रेलगाड़ी  सा धक्का।।
कटी जेब,  यात्री  के   जैसा,
मै रह गया चकित-भौचक्का।।
भाव अटपटे, पोज खटपटे, उस पर भी चटपटा स्वाद है,             
                    उसको मेरा, धन्यवाद है।।
राग   रसीला   ऐसा   जैसे,
ठुमरी  के  ऊपर   हो ठप्पा!
खाता   रहा  गपागप उसको
समझ  गोल गप्पे का गप्पा।।
किन्तु जब उठी पीर जिगर में, दूध छठी का हुआ याद है।
                                      उसको मेरा, धन्यवाद है।।’’


    भुशुंडि जी का गाँव की माटी से गहरा संबंध रहा है। वे लोक साहित्य और लोक संस्कृति की विशेषताओं से भली-भाँति परिचित थे। अतएव उन्होंने शहरी जीवन की विसंगतियों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त विडंबनाओं को अपनी लेखनी के नश्तर चुभोए हैं। इसके लिए घाघ और भड्डरी जैसे प्राचीन रचनाकारों की रचनाओं को  उन्होंने अपनी पैरोडियों का विषय बनाया है। बानगी स्वरूप उनकी कुछ पैरोडियों का आस्वादन कीजिए-

‘‘जो  लरिका   अंग्ररेजी पढ़ी । खेती करी न जोती लढ़ी।
घर का कामु काजु करि नर्क। दफतर मा बन जाई क्लर्क।।’’
लीडर  जौन  कि  छैला बनै। भाषन  मा अपने का  गनै।
करी  न कबहूँ ऐइसनि भूलि । जेल जाइकै फाँकै  धूलि।।’’

    गोस्वामी तुलसीदास की विनयपत्रिका का बहुचर्चित पद ‘अब लौ नसानी अब न नसैहौं’ की भावधारा पर आधारित एक पैरौडी प्रस्तुत है। इसमें  कवि ने उस पिता के संताप को बडे़ ही मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है, जिसका पुत्र शिक्षा के महत्त्व की अनदेखी करके बाप की गाढ़ी कमाई और अपने समय को बरबाद करता है-

                ‘‘बी.ए. तक  पढ़वायों   तुमका  अब   आगे  न पढ़ैहौं।
                   गाढ़ी कमाई  के  पैसन  का,  पानी  जस न   बहैहौं ।। अब लौ......
                   हैट  पैंट  और  कोट  हटाकर,  कुर्ता  सदा  पिन्हैहौं।
                   लैहौं   बैल    पछाहीं  हर  से  खेती  तुमहीं  करैहौं।। अब लौ...... 

कवि की एक अन्य पैरोडी रचना कविवर सूरदास के पद ‘मधुकर! कौन देश को वासी’ पर अवलम्बित है, जिसमें आधुनिक नेताओं पर करारा कटाक्ष प्रस्तुत किया गया है-

                     ‘‘नेता कौन देस के वासी।
                  बोली कउन-कउन है भाषा, कउन  तरफ के भाषी।
                  माखन टोस्ट उडावत डटि-डटि, नाम धरे हो धासी।
                  भीषण भाषण देत विभीषण, लिहे जबान टकासी।।’’

    पैरोडी लेखन में सिद्ध कवि भुशुंडि जी अपनी मौलिक विशेषताओं के कारण अद्वितीय हैं। उस युग में  स्फुट रचनाओं पर ही पैरोडियाँ लिखी जाती रहीं थीं। किसी रचनाकार की सम्पूर्ण कृति पर आधारित पैरोडी प्रकाश में नही आई थी। भुशुंडि जी ने इस चुनौती भरे कार्य का बीड़ा उठाया और जयशंकर प्रसाद की कृति ‘आँसू’ की पैरोडी ‘घड़ियाली आँसू’ लिखा। इस कृति में उन्होंने वर्तमान युग की सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था का यथातथ्य दिग्दर्शन कराया है। इसके अतिरिक्त आज की विसंगतियों, असंगतियों, विद्रूपताओं तथा मूल्यहीनता पर उन्होंने करारी चोट की है। प्रख्यात कहानीकार श्री गंगाप्रसाद मिश्र की कहानी ‘चरखा चलने के बाद की कथा’ पर उन्होंनें ‘स्कूल खुलने के बाद की कथा’ नामक पैरोडी लिखी थी। श्री गंगाप्रसाद मिश्र भुशुंडि जी के कृतित्त्व पर अपना दृष्टिकोण इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं- ‘‘भुशुंडि जी ने कितना लिखा है इसका सही लेखा-जोखा सामने आयेगा तो लोगों की आँखे खुली रह जायेंगी। यदि उन्होंने कुछ न लिख होता तो भी उनका बाल्मीकि रामायण का पद्यानुवाद ‘भुशुंडि रामायण’ उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन का परिचायक होने के साथ उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त है।’’

    भुशुंडि जी की अनन्यता की झाँकी इस अर्थ में भी अपूर्व है कि पद्य की भाँति उनका गद्य-लेखन भी साहित्यानुरागियों को अनुप्राणित करने वाला रहा है। उन्होंने काव्य पैरोडियों की भाँति कथा पैरोडियाँ भी लिखी हैं। इस दृष्टि से पं0 चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की बहुचर्चित कहानी ‘उसने कहा था’ का प्रणयन कर उन्होंने हिन्दी व्यंग्य साहित्य में एक नवीनतम प्रयोग किया। ‘माधुरी’ जैसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित होने वाली यह पहली कथा पैरोडी थी। भुशुंडि जी की कथा-पैरोडियों पर अपना अभिमत प्रकट करते हुए अनिल बाँके ने लिखा है- ‘‘हिन्दी-साहित्य में प्रथम पैरोडी कथाकार होने का श्रेय इन्हीं को प्राप्त है।’’ बच्चों के प्रति भुशुंडि जी के हृदय में अगाध प्रेम था। उन्होंने उनके लिए मनोविनोद से परिपूर्ण प्रचुर मात्रा में बालसाहित्य की सर्जना की है। सरल-सुबोध भाषा में विरचित उनकी काव्य-कृति ‘बागड़-बिल्ला’ में बालोपयोगी हास्यपरक रचनाएं संग्रहीत हैं। ये रचनाएं बच्चों में कौतूहल उत्पन्न करने के साथ उनका स्वस्थ मनोरंजन भी कराती हैं। लोक जीवन में हास्य के महत्त्व को कभी नकारा नहीं जा सकता है। गाँव के खेतिहर मजदूर-किसान के मनोरंजन के साधनों में नौटंकी आज भी प्रचलित, जिसे वे बडे़ ही शौक से देखते-सुनते हैं। नौटंकियों में साहित्यिकता की अपेक्षा फूहड़पन और अश्लीलता की व्याप्ति पर सुधी रचनाकार का ध्यान गया और उनके हृदय में उसके परिष्कार की कामना बलवती हो गयी। फलतः लोकमंगल की भावना से उन्होंने अनेक हास्य-नौटंकियों की रचनाकर डाली। इन नौटंकियों में ‘दहेजमार झोला नं0 एक’, ‘दहेजमार झोला नं0 दो’, ‘दहेजमार झोला नं0 तीन’, ‘दहेज की पुड़िया’, ‘गंगा मइया की महिमा’ इत्यादि नौटंकियाँ आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित भी हुईं।

    इन हास्य-नौटंकियों में सन्निहित लोकमंगल के आलोक में डा0 कृष्णमोहन सक्सेना का कथन है-‘‘भुशुंडि जी ने पिछले दिनों हास्य नौटकियाँ लिखने में भी पहल की है। शिष्ट हास्य के प्रयोक्ता के रूप में हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा में उनका ऐतिहासिक महत्त्व है।’’ उनकी ‘मानस मनोरंजन’ नामक काव्य-कृति उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत हुई थी। वस्तुतः ‘रामचरितमानस’ जैसी गंभीर कृति पर अपनी मार्मिक टिप्पणियों से हास्य-सर्जना करना भुशुंडि जी जैसे सिद्ध रचनाकार के ही वश की बात है। समग्र रूप में उनका शब्द-चयन, लक्षणा-व्यंजना शक्ति से अभिव्यक्ति में चमत्कार उत्पन्न करना, प्रचलित मुहावरों का सार्थक प्रयोग, शिष्टता एवं रोचकता, उन्हें रस-सिद्ध, भावनिष्ठ तथा साधना-संपन्न साहित्यकार होने का अधिकारी ठहराती हैं। भुशुंडि जी को गुरुजनों का आशीष, स्वजन-सहयोगियों का प्रेम तथा अपने से कनिष्ठों का समादर प्राप्त हुआ है। आचार्य क्षेमचन्द्र ‘सुमन’ ने उन्हें जिन्दगी की चुलबुलाहट की संज्ञा से विभूषित किया है, श्री रामेश्वरदयाल दुबे ने उन्हें युग की पहचान कहकर संबोधित किया है और स्वतंत्र जी उन्हें नयी पीढ़ी का मसीहा ही मानते हैं।

    हिन्दी हास्य-व्यंग्य के विकास में श्री शारदाप्रसाद वर्मा ‘भुशुंडि’ का योगदान श्लाघनीय है। श्री सुशील अवस्थी के शब्दों में-‘‘ऐसे हास्य सम्राट भुशुंडि जी जिन्होंने अपने काव्य से जनमानस को हँसाया और व्यंग्य से विद्रूपताओं पर कटाक्ष किया, 23 अक्टूबर सन् 1992 ई0 में इक्यासी वर्ष की अवस्था में चिरनिद्रा में लीन हो गये। उनके साहित्यिक अवदान का हिन्दी जगत् सदैव ऋणी रहेगा। उनकी हास्यमयी विलक्षणता, उत्कृष्टता तथा अनन्यता उन्हें चिरकाल तक चर्चित बनाये रखने के लिए पर्याप्त है।  हिन्दी के सुधी पाठकों को शिष्‍ट एवं उत्‍कृष्‍ट हास्य के विशिष्ट रचनाकार पर सदैव गर्व रहेगा।

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