मूंछों की बैलेंसिंग : एक राष्ट्रीय समस्या
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✍️ डॉ. डंडा लखनवी
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एक समय था जब मूंछों के बालों की सामाजिक हैसियत आज के डिजिटल हस्ताक्षर जैसी हुआ करती थी। मूंछविहीन व्यक्ति को न पूरा पुरुष माना जाता था, न पूरा भरोसेमंद। कहते हैं, लोग मूंछ के बाल को रुक्का, हुंडी और ज़रूरत पड़ने पर चरित्र-प्रमाणपत्र की तरह इस्तेमाल कर लेते थे। दुर्भाग्य से जब मेरे चेहरे पर मूंछ की पहली रेख उभरी, तब तक समाज सुधार के नाम पर यह परंपरा चुपचाप दम तोड़ चुकी थी।
मूंछ को उगना था, सो उग आई। पहले वह एक संकोची-सी रेख थी—ऐसी रेख, जिसे देखकर लोग मुस्कराकर कहते थे, “अभी तो बच्चा है।” लेकिन समय के साथ उसने झाड़‑झंखाड़ का रूप धारण कर लिया। और जैसा कि सर्वविदित है—झाड़‑झंखाड़ चाहे खेत में हो या चेहरे पर, देखभाल न हो तो बदनामी तय है। मजबूरन मूंछों की देखरेख की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर उठानी पड़ गई।
युवा अवस्था का वह स्वर्णकाल आज भी स्मृतियों में मूंछें ऐंठता दिखाई देता है, जब मेरी मूंछें ‘तलवार मार्का’ हुआ करती थीं—सीधी, तनी हुई और आत्मविश्वास से भरी। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो वे चेहरे पर नहीं, सीमा पर तैनात हों। कभी‑ कभी तो मुझे ख़ुद भरोसा हो जाता था कि जब तक मूंछें सलामत हैं, देश सुरक्षित है।
उन दिनों एक कारखाने का मुलाजिम था। ड्यूटी बड़ी सख़्त थी। सुबह छह बजे काम पर निकलना होता था, यानी पाँच बजे बिस्तर को स्वेच्छा‑पूर्वक छोड़ देना पड़ता था। स्नान से पहले दर्पण के सामने ब्लेड लेकर खड़ा होना रोज़ का अनिवार्य कर्म था— यह एक ऐसा कर्म था, जिसमें दाढ़ी से ज़्यादा मन की परतें कटती थीं।
दाढ़ी तो बड़ी आसानी से निपट जाती थी, लेकिन असली समस्या मूंछों की बैलेंसिंग में आती थी। जल्दबाज़ी में शेविंग करते समय दोनों ओर की मूंछों को बराबर रखना किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते से कम नहीं लगता था। ज़रा‑सी चूक और एक मूंछ तराजू के एक पलड़े की तरह झुक जाती, जबकि दूसरी विश्वगुरु बनने को आतुर दिखाई देती।
मैं एक ओर ब्लेड चलाता—दूसरी नाराज़। दूसरी ओर सुधार करता—पहली बगावत पर उतर आती। स्थिति ऐसी बन जाती मानो दोनों मूंछें आपस में राजनीतिक गठबंधन में हों—न साथ रहना संभव, न अलग होना। इस असंतुलन को ठीक करते‑करते मूंछें दिन‑प्रतिदिन छोटी होती चली गईं। तलवार मार्का मूंछें पहले कटार बनीं, फिर चाकू और अंत में करौली पर आकर ठहर गईं।
विडंबना यह कि मूंछें छोटी होती गईं, लेकिन समस्या उतनी ही विशाल बनी रही। दर्पण में चेहरा नहीं, किसी असफल राष्ट्रीय परियोजना की रिपोर्ट दिखाई देती। तब समझ में आया कि समस्या मूंछों की नहीं, संतुलन की है—और संतुलन बनाना हर किसी के बस की बात नहीं।
आख़िरकार एक दिन मैंने ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्णय लिया। दाढ़ी के साथ‑साथ मूंछों पर भी ब्लेड चला दिया। न मूंछ रही, न बैलेंसिंग की समस्या। दर्पण में चेहरा हल्का‑फुल्का लग रहा था और मन में असीम शांति थी—वैसी शांति, जैसी किसी जटिल समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने पर मिलती है।
तब से मैंने जीवन का यह अटल सिद्धांत अपना लिया है—जब संतुलन बनाना असंभव हो जाए, तो विषय ही समाप्त कर देना चाहिए। मूंछें चली गईं, लेकिन एक अमूल्य अनुभव दे गईं—कि जीवन में हर समस्या का समाधान संतुलन में नहीं, कभी ‑कभी सफाचट निर्णय में भी होता है।
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