13 जनवरी 2026

खेल की भावना बनाम कट्टरता


✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

➖➖➖➖➖➖➖

खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज को जोड़ने वाला एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु है। खेल मैदान वह स्थान है जहाँ भाषा, धर्म, जाति, नस्ल और राष्ट्रीय सीमाएँ गौण हो जाती हैं और मानव प्रतिभा तथा परिश्रम ही सर्वोपरि होता है। इसी कारण कहा जाता है कि खेलों का धर्म केवल खेल की भावना है।



खेल की भावना का अर्थ



खेल की भावना का आशय निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, नियमों के प्रति सम्मान, प्रतिद्वंद्वी के प्रति गरिमा और जीत–हार को सहज रूप से स्वीकार करने से है। खेल हमें अनुशासन, टीम-वर्क, सहिष्णुता और आत्मसंयम सिखाते हैं। यही मूल्य खेलों को समाज-निर्माण का सशक्त माध्यम बनाते हैं।



खेलों में कट्टरता का बढ़ता प्रवेश



दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में खेलों में धर्म, जाति और नस्ल आधारित कट्टरता का प्रवेश एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। खिलाड़ी अब कई बार अपने खेल से अधिक अपनी पहचान के कारण चर्चा में आ जाते हैं। दर्शकों के नारे, सोशल मीडिया पर टिप्पणियाँ और यहाँ तक कि चयन प्रक्रिया में पक्षपात—ये सभी खेल की मूल आत्मा को आहत करते हैं।



नस्ल और रंगभेद : इतिहास की चेतावनी



इतिहास साक्षी है कि जब खेलों में नस्ल और रंगभेद हावी हुए, तब खेल को वैश्विक अपमान का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका का रंगभेदी दौर इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जब अंतरराष्ट्रीय दबाव के बिना वहाँ खेलों में समानता की कल्पना भी संभव नहीं थी। यह अनुभव हमें सिखाता है कि खेल में भेदभाव को “आंतरिक मामला” मानकर अनदेखा करना घातक हो सकता है।



खेल समाज का दर्पण



खेल समाज का आईना होते हैं। यदि समाज में कट्टरता, असहिष्णुता और विभाजन बढ़ता है, तो उसका प्रतिबिंब खेल मैदान में भी दिखाई देता है। परंतु यही खेल समाज को सही दिशा देने का माध्यम भी बन सकते हैं। एक टीम में विभिन्न धर्मों, जातियों और नस्लों के खिलाड़ी मिलकर खेलें—यह दृश्य अपने आप में सामाजिक समरसता का संदेश देता है।



समाधान और सामूहिक जिम्मेदारी



खेलों को कट्टरता से मुक्त रखने के लिए खेल संस्थाओं, सरकारों, मीडिया और दर्शकों—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। भेदभाव के विरुद्ध सख्त नियम, नैतिक शिक्षा, संवेदनशील मीडिया कवरेज और दर्शकों का जिम्मेदार व्यवहार आवश्यक है। खिलाड़ियों को भी यह समझना होगा कि वे केवल खिलाड़ी नहीं, बल्कि समाज के प्रेरक प्रतीक हैं।



निष्कर्ष



खेलों को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए—यही उनका सार और सौंदर्य है। जब खेल मैदान भेदभाव और कट्टरता से मुक्त होता है, तभी वह मानवता के मूल मूल्यों—समानता, भाईचारे और सम्मान—को सशक्त करता है। यदि खेल हार गया, तो केवल एक मैच नहीं हारेगा, बल्कि समाज अपने भविष्य की एक उज्ज्वल संभावना खो देगा।

🈴🈴🈴🈴🈴

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणीयों का सदैव स्वागत है......