✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी
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सत्य वही नहीं होता जो किसी एक क्षण या एक दृष्टि से दिखाई दे जाए। वह अनुभव, स्थान, समय और दृष्टिकोण के साथ अलग- अलग रूपों में प्रकट होता है। इसी कारण सत्य को समझने के लिए समग्र दृष्टि की आवश्यकता होती है।
सन् 1970 में मैं दिल्ली गया था और वहाँ स्थित कुतुबमीनार को देखने का अवसर मिला। उस समय पर्यटकों को मीनार की पाँचवीं मंज़िल तक जाने की अनुमति थी। ऊपर पहुँचकर जो दृश्य दिखाई देता था, वह नीचे खड़े दर्शक की कल्पना से कहीं अधिक विस्तृत और भिन्न होता था। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं; कुछ दुर्घटनाओं के बाद ऊपर जाने का मार्ग बंद कर दिया गया। अब पर्यटक उस अनुभव को केवल सुन या पढ़ सकते हैं, देख नहीं सकते।
इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि एक ही वस्तु या घटना को देखने वाले सभी लोगों को एक जैसा दृश्य प्राप्त नहीं होता। जो व्यक्ति ऊँचाई पर खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न है और जो नीचे खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न। वस्तुतः एक ही समय में सभी फलक दृश्य-मान नहीं होते।
भूतकाल की घटनाएँ इतिहास बन जाती हैं। उन्हें हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते, केवल पढ़कर या सुनकर उनका अनुमान लगाते हैं। भविष्य अभी आया नहीं है, उसकी केवल कल्पना की जा सकती है। वर्तमान भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके स्थान और दृष्टिकोण के अनुसार अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। इस प्रकार दृष्टिकोण बदलने से नज़ारा बदल जाता है।
यही कारण है कि एकांगी दृष्टिकोण अपनाने से पूर्ण सत्य का बोध असंभव हो जाता है। किसी भी वस्तु, विचार या घटना को समझने के लिए उसके सभी पक्षों का समग्रता से आकलन आवश्यक होता है।
भारतीय दर्शन में इस सत्य को जैन दर्शन ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया है। जैन दर्शन में सत्य की समग्र अनुभूति को स्यादवाद से जोड़ा गया है। स्यादवाद यह स्वीकार करता है कि सत्य बहुआयामी होता है। कोई भी कथन पूर्ण रूप से तभी सत्य हो सकता है, जब उसे विभिन्न अपेक्षाओं और दृष्टिकोणों से देखा जाए। प्रत्येक कथन ‘स्यात्’— अर्थात् किसी विशेष संदर्भ में—सत्य होता है, किंतु वही अंतिम और पूर्ण सत्य नहीं होता।
जिस प्रकार कुतुबमीनार की ऊँचाई से दिखाई देने वाला दृश्य नीचे खड़े व्यक्ति को उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार सत्य भी केवल एक दृष्टि से पूर्ण रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता। अनेक दृष्टियों का समन्वय ही सत्य की वास्तविक पहचान कराता है।
अतः यह स्पष्ट है कि सत्य न तो केवल देखा जा सकता है और न ही एकांगी रूप से समझा जा सकता है। सत्य वास्तव में समग्रता का बोध है—जो अनुभव, समय, स्थान और दृष्टिकोण के संतुलित समन्वय से ही संभव हो पाता है।
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