13 जनवरी 2026

✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी

 समय : घड़ी नहीं, मन का शरारती रिश्तेदार

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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समय बड़ा विचित्र प्राणी है। घड़ी में तो वह बड़ी ईमानदारी से टिक-टिक करता रहता है, पर हमारे मन में आते ही उसका चरित्र बदल जाता है। जैसे ही मनोदशा बदली, समय ने भी कपड़े बदल लिए। कभी वह कछुए की चाल चलता है, तो कभी खरगोश को भी मात दे देता है।


जब आप किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं—विशेषकर उस व्यक्ति की, जो “बस पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ” कहकर आधे घंटे बाद आता है—तब समय ऐसा सुस्त हो जाता है मानो उसे सरकारी नौकरी मिल गई हो। सेकेंड मिनट बन जाते हैं और मिनट युग में बदल जाते हैं। घड़ी की सुइयाँ मानो कहती हैं—“आज मूड नहीं है, कल चलेंगे।”



इसके ठीक उलट, जब आपको देर हो रही होती है, तब समय अचानक ओलंपिक का धावक बन जाता है। नहाने के लिए गए और बाहर निकले तो पता चला—समय आपसे आगे निकल चुका है। बस छूट चुकी है, ट्रेन आँखों से ओझल है और समय आपको पीछे खड़े होकर मुस्कुरा रहा है—“अब बताओ, कितने बजे की घड़ी पहन रखी है?”



दुख की अवस्था में समय का व्यवहार सबसे निर्दयी हो जाता है। वह न आगे बढ़ता है, न पीछे हटता है—बस वहीं खड़ा होकर आपको घूरता रहता है। लगता है मानो उसने शपथ ले ली हो कि आज वह हिलेगा ही नहीं। हर पल भारी, हर क्षण बोझिल— समय नहीं, कोई पत्थर सीने पर रखा हो ऐसा लगता है।



इसके विपरीत, प्रसन्नता के क्षणों में समय बड़ा चालाक निकलता है। आप हँसते- खेलते हैं और समय चुपचाप निकल जाता है। पता ही नहीं चलता कि कब घंटा बीत गया। तब हम कहते हैं—“अरे, समय का पता ही नहीं चला!” वास्तव में समय का पता नहीं चला, क्योंकि वह बिना बताए भाग गया।




और जब आप ऊब रहे होते हैं, तब समय की लंबाई बढ़ जाती है। पाँच मिनट की बैठक पाँच घंटे की लगती है। भाषण छोटा हो या लंबा, ऊब की अवस्था में हर सेकेंड “दीर्घकालीन योजना” बन जाता है। तब समय नहीं, धैर्य की परीक्षा चल रही होती है।



कष्ट में समय का असली चेहरा सामने आता है। वह न कटता है, न घटता है। घड़ी देखो तो वही मिनट, दोबारा देखो तो वही मिनट। ऐसा लगता है जैसे समय आपको चिढ़ाने के लिए वहीं बैठ गया हो—“क्या कर लोगे? मैं यहीं हूँ!”



अंततः निष्कर्ष बड़ा स्पष्ट है—समय वैसा नहीं होता जैसा घड़ी दिखाती है, समय वैसा होता है जैसा मन महसूस कराता है। घड़ी तो बस बहाना है; असली खेल मनोदशा का है। इसलिए अगली बार अगर समय तेज या धीमा लगे, तो घड़ी को दोष मत दीजिए— मन से पूछिए, आज उसका मूड कैसा है।

क्योंकि समय बदलना कठिन है, पर मन बदल जाए तो समय अपने 

आप बदल जाता है।

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