आलू : मिट्टी से थाली तक की एक यात्रा
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✍🏻 डॉ, डंडा लखनवी
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आज हमारी रसोई में यदि कोई सब्ज़ी सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, तो वह आलू है। अमीर की थाली में भी वही आलू दमकता है और गरीब की रोटी के साथ भी वही सहारा बनता है। अकेले भी वह सम्पूर्ण है और दूसरी सब्ज़ियों के साथ मिलकर भी अपनी पहचान नहीं खोता। इसीलिए लोकजीवन ने उसे ससम्मान “सब्ज़ियों का राजा” कहा जाता है। परंतु यह राजा जन्म से राजसिंहासन पर नहीं बैठा था। इसका इतिहास उतना ही रोचक है जितना इसका स्वाद।
आलू की जन्मभूमि दक्षिण अमेरिका मानी जाती है—पेरू और बोलीविया के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र। वहाँ के आदिवासी समुदायों ने हज़ारों वर्ष पहले इस साधारण-सी दिखने वाली कंद सब्ज़ी को पहचाना, अपनाया और अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया। पहाड़ों की ठंडी मिट्टी में उगने वाला आलू वहाँ जीवन-रक्षक था—ऊर्जा भी देता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।
सोलहवीं शताब्दी में जब यूरोपीय खोजी संसार को नापने निकले, तब आलू भी जहाज़ों पर सवार होकर नए महाद्वीपों की ओर चल पड़ा। स्पेन के रास्ते वह यूरोप पहुँचा, पर प्रारंभ में उसे संदेह की दृष्टि से देखा गया। ज़मीन के नीचे पैदा होने वाली इस चीज़ को कई लोग अशुभ मानते थे। कुछ ने तो इसे बीमारी का कारण तक समझ लिया। पर समय के साथ आलू ने अपने गुणों से सभी शंकाओं को पराजित कर दिया। धीरे-धीरे वह यूरोप की थाली में स्थायी अतिथि बन गया।
भारत में आलू के आगमन का श्रेय प्रायः पुर्तगाली व्यापारियों को दिया जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में वे इसे अपने साथ लेकर आए। आरंभ में आलू शाही रसोई और अंग्रेज़ अफसरों की मेज़ तक सीमित रहा, पर भारतीय मिट्टी ने इसे तुरंत अपना लिया। गंगा–यमुना के मैदान हों या दक्कन का पठार—आलू हर जगह सहजता से उग आया।
भारतीय समाज में आलू का इतिहास केवल खेती का इतिहास नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता की कथा भी है। जाति, वर्ग और क्षेत्र की सीमाएँ तोड़ते हुए आलू हर रसोई में प्रवेश कर गया। व्रत में भी आलू चलता है, साधु की झोली में भी और उत्सव की थाली में भी। सब्ज़ी कम हो तो आलू काम आ जाता है, मेहमान अधिक हों तो भी वही सहारा बनता है।
आलू ने भारतीय व्यंजनों को नई पहचान दी—आलू की सब्ज़ी, दम आलू, आलू पराठा, समोसा, टिक्की और न जाने कितने रूप। उसने स्वाद के साथ-साथ पेट और बजट—तीनों का संतुलन साधा।
आज आलू केवल एक सब्ज़ी नहीं, बल्कि समय का साक्ष्य है। वह बताता है कि कैसे एक विदेशी कंद भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। मिट्टी में जन्मा, समुद्र पार से आया और थाली में नायक बन गया— देश-देशांतरों के बीच आलू की़ यात्रा मनुष्य की अनुकूलनशीलता और भोजन की सांस्कृतिक शक्ति की कहानी भी है।
इसलिए जब अगली बार रसोई में आलू हाथ में आए, तो उसे साधारण न समझिए। उसके भीतर इतिहास भी है, भूगोल भी और लोकजीवन की
आत्मा जुड़ी है।
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