10 फ़रवरी 2026

चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’

(2 फरवरी 1914 – 18 अप्रैल 1982)

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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आज जब हम अवधी लोकभाषा के अप्रतिम हास्य-व्यंग्यकार चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ की जयंती स्मरण कर रहे हैं, तब यह अनुभूति और गहरी हो जाती है कि लोकजीवन से उपजा साहित्य समय की सीमाओं को लांघकर समाज को दिशा देता है। रमई काका ऐसे रचनाकार थे, जिन्होंने हास्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं बनने दिया, बल्कि उसे सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा और जनजागरण का माध्यम बनाया।



रमई काका का जन्म 2 फरवरी 1914 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद स्थित टिकौली ग्राम में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय वृंदावन त्रिवेदी द्वितीय विश्वयुद्ध में देशसेवा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। माता गंगा देवी के संरक्षण में उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा हुई। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद उनके भीतर लोकसंस्कृति और भाषा की विलक्षण समझ विकसित हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें जनप्रिय साहित्यकार बनाया।



जीविकोपार्जन के सिलसिले में लखनऊ आने के बाद उनका जुड़ाव आकाशवाणी लखनऊ से हुआ। यहीं से रमई काका की रचनात्मक प्रतिभा को व्यापक मंच मिला। गोपाल प्रसाद व्यास ने उनके अवधी भाषा- प्रयोग की सराहना की है, वहीं अमृतलाल नागर ने उनकी मधुर वाणी और सूझबूझ से भरी हास्य नाटिकाओं को रेडियो श्रोताओं के लिए अविस्मरणीय बताया। विशेष रूप से ‘बहरे बाबा’ श्रृंखला ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।



रमई काका का साहित्य ग्रामीण जीवन की मिट्टी से सीधा जुड़ा हुआ है। किसानों के सुख-दुख, आर्थिक विषमता, सामाजिक अन्याय, राजनीतिक छल और मानवीय स्वार्थ—इन सबका सजीव चित्रण उनकी रचनाओं में मिलता है। उन्होंने बौछार, भिनसार और फुहार जैसे काव्य-संग्रहों के माध्यम से अवधी हास्य-व्यंग्य को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। फुहार को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सम्मानित किया जाना उनके साहित्यिक योगदान की आधिकारिक स्वीकृति है।



आर्थिक असमानता पर प्रहार करती उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं—


“वह दूध जलेबी खाय रोजु, हम सूखी रोटी पावति हैं।”


इन सरल पंक्तियों में छिपा व्यंग्य समाज की गहरी विषमता को उजागर कर देता है। इसी प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य और सत्ता-व्यवस्था की विसंगतियों पर किया गया उनका कटाक्ष लोकभाषा में व्यक्त जनआक्रोश का सशक्त रूप है।



रमई काका की विशेषता यह थी कि उनका व्यंग्य कटु नहीं, करुणा से भीगा हुआ था। वे हँसाते हुए सोचने को विवश करते थे। अवधी लोकोक्तियों, मुहावरों और प्रतीकों के कुशल प्रयोग ने उनकी रचनाओं को जनसुलभ और प्रभावशाली बनाया। अशिक्षित ग्रामीण समाज को जागरूक करने और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनचेतना जगाने में उनकी रचनाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।



जयंती के इस अवसर पर रमई काका को स्मरण करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस लोकसंस्कृति और लोकभाषा को सम्मान देना है, जो आज के भूमंडलीकृत समय में हाशिए पर जा रही है। रमई काका का साहित्य हमें यह सिखाता है कि हास्य भी सामाजिक परिवर्तन का सशक्त औजार हो सकता है। हिंदी और अवधी साहित्य में उनका योगदा

न चिरस्मरणीय है।

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