पंचशील और भारतीय संस्कृति
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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किसी भी सभ्यता की आत्मा उसके महान व्यक्तियों के आचरण में प्रतिबिंबित होती है। संस्कृति केवल रीति-रिवाजों या परंपराओं का समुच्चय नहीं होती, बल्कि वह नैतिक मूल्यों और सदाचारों की जीवंत अभिव्यक्ति होती है। एक समय था जब भारतीय संस्कृति का संसार में विशेष मान था। तथागत बुद्ध की करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग की शिक्षाएँ एशिया के विशाल भूभाग में गूंज रही थीं। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालय ज्ञान के आलोक-स्तंभ थे। उस काल में भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व का केंद्र था।
इस गौरवशाली परंपरा के मूल में पंचशील का अनुशासित पालन निहित था। पंचशील—सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—केवल बौद्ध दर्शन की देन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। इनका पालन करने वाला व्यक्ति निष्कलुष, संयमी और न्यायप्रिय माना जाता था। यही कारण है कि समाज में ऐसे ही व्यक्तियों को नेतृत्व और न्याय की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ‘सरपंच’ की अवधारणा भी इसी नैतिक चेतना से जुड़ी मानी जाती है—अर्थात वह व्यक्ति जो शीलों का प्रधान हो।
दुर्भाग्यवश, आधुनिक समय में पंचशील का अर्थ और महत्व जनसामान्य की स्मृति से ओझल होता जा रहा है। सामाजिक जीवन के प्रायः हर क्षेत्र में पाखंड, छल और अवसरवाद का विस्तार दिखाई देता है। सत्य के स्थान पर सुविधा, संयम के स्थान पर उपभोग और नैतिकता के स्थान पर स्वार्थ ने पैर पसार लिए हैं। शील अर्थात सदाचार का जीवन में सर्वोपरि महत्व है—सत्य बोलना, चोरी न करना, मादक पदार्थों से परहेज, नारी के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि और छल-प्रपंच से दूरी—ये सभी मूल्य किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं हैं। ये तो मानवता की साझा धरोहर हैं।
इतिहास साक्षी है कि अंग्रेज जहाँ-जहाँ गए, वहाँ की संस्कृतियों की उपयोगी विशेषताओं को आत्मसात कर उन्होंने स्वयं को सुदृढ़ किया। भारत से भी उन्होंने बहुत कुछ सीखा और समयबद्धता, अनुशासन तथा संस्थागत नैतिकता के बल पर आगे बढ़े। विडंबना यह रही कि हमने उनके खान-पान, रहन-सहन और बाह्य आडंबरों की नकल तो की, किंतु उनके अनुशासन, समयपालन और नैतिक कार्यसंस्कृति को अपनाने में संकोच दिखाया। केवल अनुकरण किसी समाज को उन्नत नहीं बनाता; आवश्यक है मूल्यों का आत्मसात।
यह भी आत्ममंथन का विषय है कि आंतरिक नैतिक दुर्बलताओं और सामाजिक विघटन ने भारत को पराधीनता की ओर धकेला। जब सदाचार शिथिल होता है, तब बाहरी शक्तियाँ अवसर खोज ही लेती हैं। अतः आज आवश्यकता है पंचशील को अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा के रूप में पुनर्स्थापित करने की।
यदि भारत को सामाजिक शांति, नैतिक सुदृढ़ता और वैश्विक सम्मान की ओर अग्रसर होना है, तो पंचशील को व्यक्तिगत आचरण से लेकर सार्वजनिक जीवन तक पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। पंचशील केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सभ्य समाज की शर्त है। इन्हीं मूल्यों के पुनर्जागरण में भारत की सांस्कृतिक पुनर्निर्मिति और मानवीय भविष्य निहित है।
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परिष्कृत संस्करण
: पुनर्प्रकाशित
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