रुपया! तू बड़ा बहुरूपिया
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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रुपया इस देश का सबसे सफल अभिनेता है। इसे न कोई राष्ट्रीय पुरस्कार चाहिए, न अभिनय विद्यालय—हर दृश्य में फिट, हर भूमिका में हिट। हालात बदलते ही इसका नाम, काम और चरित्र बदल जाता है। चरित्रहीन मनुष्य बदनाम होता है, पर चरित्रहीन रुपया व्यवस्था कहलाता है।
बैंक में जब रुपया लौटने से इनकार कर देता है, तो उसे चोर नहीं कहा जाता—उसे सम्मानजनक उपाधि मिलती है एनपीए। यह वह अवस्था है जहाँ रुपया मर जाता है, लेकिन काग़ज़ों में ज़िंदा रहता है। मंदिर पहुँचते ही वही रुपया पाप धोने की मशीन बन जाता है—डालो चढ़ावा, निकालो पुण्य। पुजारी जी के हाथ में आते ही उसका नाम बदलकर दक्षिणा हो जाता है—ईश्वर का रास्ता हमेशा कैश काउंटर से होकर जाता है।
सड़क किनारे वही रुपया भीख कहलाता है—देने वाले की दया और लेने वाले की विवशता का सिक्का। महलों में वही सिक्का नज़राना बनकर गर्व से झुकता है। लोकतंत्र में आकर रुपया पूरी तरह बेलगाम हो जाता है—कहीं विधायक निधि, कहीं सांसद निधि—नाम विकास का, काम फाइलों का।
नौकरी के अंत में वही रुपया पेंशन बनकर जीवन रेखा कहलाता है, और अपराधियों के हाथ लगते ही फिरौती बनकर जीवन का मूल्य तय करता है—आजकल जान की कीमत बाजार भाव से चलती है।
स्कूल में पहुंचकर रुपया फ़ीस बन जाता है —ज्ञान से पहले जमा, सवाल बाद में। शादी में वही रुपया दहेज बनकर रिश्तों की नीलामी करता है। किसी के पास ईमानदारी से रखा जाए तो धरोहर, और अगर रिश्ते टूट जाएँ तो वही रुपया गुज़ारा भत्ता बनकर ‘इंसाफ़’ की औपचारिक रसीद थमा देता है।
कचहरी में रुपया प्रतिभूति बनकर भरोसे की कीमत तय करता है। ज़रूरत में कर्ज़, और लौटाने की बारी आए तो वही कर्ज़ सरदर्द बन जाता है। दानवीर का दान वही है जो दिखे, और हर्जाना, जुर्माना वही जो चुभे। सरकार के पास जाए तो कर, और जनता के पास पहुँचे तो चमत्कार।
होटल में वही रुपया टिप बनकर सम्मान पाता है, बैंक में ऋण बनकर आज़ादी छीनता है, और समय के साथ ब्याज बनकर खून चूसता है। दफ़्तर में वही रुपया वेतन कहलाता है—जो महीने के अंत तक आते- आते इतिहास बन जाता है। भत्ते के रूप में रुपया वे सपने हैं, जो पर्चियों में पूरे होते हैं।
लेखक को वही रुपया पारिश्रमिक बनकर ‘मान’ देता है, और मज़दूर को मज़दूरी बनकर ‘काम चलाऊ जीवन’। बीमा कंपनी के लिए वह प्रीमियम, मकान मालिक के लिए किराया, और भ्रष्ट अफ़सर के लिए वही पुराना परिचित—रिश्वत।
साल में एक बार वही रुपया बोनस बनकर उम्मीद जगाता है, सौदे में बयाना बनकर फँसाता है, और अपराध की दुनिया में सुपाड़ी बनकर इंसानियत को रगड़ देता है।
धर्म भी रुपये से अछूता नहीं—कहीं वह ज़कात बनकर इंसान को इंसान से जोड़ता है, तो कहीं वही रुपया धर्म का ठेकेदार बनकर इंसान को इंसान से तोड़ देता है।
अंततः निष्कर्ष यही है—
रुपया न पवित्र है, न अपवित्र;
वह एक अभिनेता है,
जो हमारे चरित्र की नक़ल करता है।
हम जैसे होते हैं
, रुपया वैसा ही दिखता है।
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