शहीद जगदेव प्रसाद कुशवाहा
सामाजिक न्याय के अमर योद्धा
(02 फरवरी, 1922–05 सितंबर 1974)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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बिहार की धरती ने अनेक जननायकों को जन्म दिया है, जिन्होंने शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध संघर्ष को जीवन का लक्ष्य बनाया। इन्हीं में एक तेजस्वी, निर्भीक और क्रांतिकारी नाम है— शहीद जगदेव प्रसाद। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि सामाजिक न्याय की वैचारिकी को व्यवहार में उतारने वाले योद्धा थे। उनका जीवन उत्पीड़ित वर्गों के आत्मसम्मान, अधिकार और सत्ता में भागीदारी की अनथक लड़ाई का प्रतीक है।
जीवन परिचय
जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के भोजपुर ज़िले (तत्कालीन शाहाबाद) में हुआ। वे प्रारंभ से ही तेजस्वी बुद्धि, तार्किक सोच और अन्याय के प्रति असहिष्णु स्वभाव के थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने समाज की संरचनात्मक विषमताओं को गहराई से समझा और महसूस किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद सामाजिक स्वतंत्रता अब भी अधूरी है।
वे कुछ समय तक मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े, किंतु शीघ्र ही उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि सत्ता की पारंपरिक राजनीति बहुजन समाज के वास्तविक प्रश्नों को हाशिये पर रखती है। इसी वैचारिक असंतोष ने उन्हें शोषित समाज दल की स्थापना की ओर प्रेरित किया। यह दल केवल राजनीतिक मंच नहीं था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का वैचारिक आंदोलन था। 05 सितंबर 1974 को पटना में एक शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार वे सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हो गए। उनकी शहादत ने उन्हें विचारों की दुनिया में अमर बना दिया।
जगदेव प्रसाद की वैचारिकी
जगदेव प्रसाद की वैचारिकी का केंद्रबिंदु था— बहुजन समाज की सत्ता में भागीदारी। उनका प्रसिद्ध नारा “सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है” भारतीय सामाजिक संरचना पर तीखा प्रहार करता है। यह नारा केवल संख्या का उद्घोष नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, अधिकार और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की माँग है।
1. सामाजिक न्याय की अवधारणा
जगदेव प्रसाद का मानना था कि जाति- आधारित शोषण भारत की सबसे बड़ी सच्चाई है। जब तक पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। वे सामाजिक न्याय को केवल आरक्षण तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि इसे सत्ता, संसाधन और सम्मान से जोड़कर देखते थे। उनकी दृष्टि में मनुवाद सांस्कृतिक और वैचारिक वर्चस्व का प्रतीक था। वे कहते थे कि वह व्यवस्था है जो श्रम करने वालों को हीन और शोषण करने वालों को श्रेष्ठ ठहराती है, उसके विरुद्ध संघर्ष को वे सामाजिक क्रांति की अनिवार्य शर्त मानते थे।
3. लोकतंत्र की पुनर्परिभाषा
जगदेव प्रसाद के अनुसार, लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है। जब तक बहुसंख्यक समाज सत्ता से बाहर है, तब तक लोकतंत्र एक छलावा है। वे “संख्यात्मक लोकतंत्र” के साथ-साथ “सामाजिक लोकतंत्र” की स्थापना के पक्षधर थे।
4. वैचारिक निर्भीकता
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी— निर्भीकता। वे किसी भी कीमत पर अपने विचारों से समझौता नहीं करते थे। सत्ता, लोकप्रियता या समझौतावादी राजनीति उन्हें स्वीकार नहीं थी। यही कारण है कि वे अल्प समय में ही सत्ता प्रतिष्ठान के लिए असुविधाजनक बन गए। शहीद जगदेव प्रसाद को अक्सर “पिछड़ों का लेनिन” कहा जाता है। उनकी वैचारिकी ने बाद के वर्षों में बिहार ही नहीं, पूरे उत्तर भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। मंडल आंदोलन, सामाजिक न्याय की राजनीति और बहुजन चेतना के विकास में उनके विचारों की स्पष्ट छाया देखी जा सकती है।
आज जब सामाजिक असमानता, प्रतिनिधित्व का संकट और वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तब जगदेव प्रसाद के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष से आता है।
शहीद जगदेव प्रसाद का जीवन एक विचारशील बलिदान था। उन्होंने दिखाया कि राजनीति सत्ता पाने का नहीं, समाज बदलने का माध्यम हो सकती है। उनकी शहादत हमें यह स्मरण कराती है कि सामाजिक न्याय कोई दया नहीं, बल्कि अधिकार है—और उसके लिए संघर्ष अपरिहार्य है। जगदेव प्रसाद भले ही देह रूप में हमारे बीच न हों, किंतु उनकी वैचारिकी आज भी हर उस आवाज़ में जीवित है जो बराबरी, सम्मा
न और न्याय की बात करती है।
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