मुहावरों की मार से कराहती
एक प्राणी का दुखड़ा
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✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी
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आज मैं आपके सामने न किसी सरकार की शिकायत लेकर आया हूँ,
न विपक्ष की—
आज मैं आवाज़ बना हूँ
उस प्राणी की जो इस देश में सबसे ज़्यादा बदनाम है,
और सबसे ज़्यादा दूध देती है—
मेरा मतलब–भैंस!
आप ज़रा सोचिए—
बच्चा पैदा होते ही
दूध किसका पीता है?
भैंस का!
और वह भी—
बोर्नवीटा डाल-डाल कर,
कॉम्प्लान मिलाकर,
बादाम घिसकर!
लेकिन जैसे ही बच्चा
कॉपी-किताब के लायक होता है,
निबंध लिखवाया जाता है—
“गाय पर निबंध लिखो।”
“हाथी पर निबंध लिखो।”
“कुत्ते पर निबंध लिखो।”
भैंस पर क्यों नहीं?
क्या भैंस पर लिखने से
मार्क्स कम हो जाते हैं?
या परीक्षक को लगता है—
भैंस विषय नहीं, सज़ा है!
और अगर बच्चा लिख न पाए,
तो तुरंत फ़तवा जारी—
“काला अक्षर भैंस बराबर!”
अरे भाई!
तो फिर बताइए—
काला अक्षर हाथी बराबर क्यों नहीं?
या कुत्ता बराबर क्यों नहीं?
क्या बाकी जानवर
जेएनयू से पढ़े हैं,
और भैंस किसी प्राइवेट कॉलेज से?
कोई आदमी ज़रा-सी गलती कर दे,
तो समाज का निर्णय तुरंत आता है—
“गई भैंस पानी में!”
अब मेरा सीधा-सा सवाल है—
बाकी जानवर कहाँ जाते हैं?
क्या गाय गंगा में जाती है?
हाथी स्विमिंग पूल में?
और कुत्ता…
कोका-कोला में?
और अगर कोई समझाने पर भी न समझे,
तो कहा जाता है—
“भैंस के आगे क्या बीन बजाना।”
तो बाकी के आगे क्या बजाते हैं?
शास्त्रीय संगीत?
ग़ज़ल?
या सीधे राष्ट्रीय गीत?
इतनी बदनामी कम थी कि
अब आलस का भी ठीकरा
भैंस के सिर पर फोड़ दिया—
“भैंस चरने भेज दो!”
अरे साहब,
भैंस चराना इतना आसान होता
तो आधी बेरोज़गारी
उसी दिन खत्म हो जाती!
कम से कम भैंस को यह तो पता है
कि घास खानी है—
इंसान को तो यह भी नहीं पता
कि सच बोलना है या ट्वीट करना है!
(तालियों का इंतज़ार करते हुए)
और सबसे मज़ेदार बात सुनिए—
भैंस को हमने
न मूर्ख होने का हक़ दिया,
न समझदार होने का!
समझदार होती तो—
“चालाक भैंस” कहते,
मूर्ख होती तो—
“बेचारी भैंस” कहते।
लेकिन नहीं!
भैंस तो बस
मुहावरों की कुल्फी है—
जिसे हर कोई चाटता है!
(स्वर बदलकर, गंभीर व्यंग्य)
एक दिन भैंस ने सोचा—
अगर मैं गाय होती,
तो आज मंदिर में होती।
अगर मैं कुत्ता होती,
तो घर के सोफ़े पर होती।
अगर मैं हाथी होती,
तो सरकारी जुलूसों में होती।
लेकिन मैं भैंस हूँ—
इसलिए
हर ग़लती का ठप्पा
मेरे नाम पर लगता है!
(समापन की ओर, तीखा प्रहार)
ध्यान दीजिए—
दूध भैंस देती है,
घी भैंस देती है,
मक्खन भैंस देती है—
और गालियाँ?
वह भी भैंस ही खाती है!
शायद इसलिए
क्योंकि भैंस चुप रहती है, बोलती नहीं,
लेकिन जिस दिन भैंस बोल पड़ी न—
उस दिन भाषा-विज्ञान की सा
री किताबें
पानी में चली जाएँगी…
और तब कोई कहेगा—
“गई भैंस पानी में!”
धन्यवाद! 🙏
(अब आप ताली बजाइए—
भैंस के सम्मान में!)
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