राजकुमारी अमृत कौर :: एक जीवन-दृष्टि
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
✍️ डॉ. गिरिजा कुमार वर्मा
➖➖➖➖➖➖➖➖
जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास रचा जा रहा था, तब एक सधी हुई अंग्रेज़ी बोलने वाली, ऑक्सफोर्ड-शिक्षित राजकुमारी गांधीजी के साथ असहयोग आंदोलन में जेल जाने को तैयार खड़ी थी। उनका नाम था राजकुमारी अमृत कौर आहलुवालिया — एक ऐसी विभूति जिनका जीवन सेवा, संघर्ष और संवेदनशील नेतृत्व का अप्रतिम उदाहरण बन गया।
🔶 जीवन परिचय
राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1887 को लखनऊ में हुआ। वे कपूरथला रियासत के शाही परिवार से थीं। उनके पिता राजा सर हरनाम सिंह एक सुसंस्कृत और धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने बच्चों को भारतीय परंपरा और यूरोपीय शिक्षा दोनों में दक्ष बनाया। अमृत कौर की प्रारंभिक शिक्षा शर्बोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स (Sherborne School for Girls) इंग्लैंड में हुई और उन्होंने आगे की पढ़ाई ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से की। धर्म से ईसाई, विचारों से मानवतावादी और कर्म से राष्ट्रभक्त — उन्होंने अपने जीवन का हर चरण भारत की सेवा को समर्पित कर दिया।
🔶 स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
1919 में अमृत कौर की गांधीजी से भेंट हुई — यह जीवन की दिशा बदल देने वाला क्षण था। वे उनके विचारों से अत्यंत प्रभावित हुईं और भारत लौटकर सक्रिय राजनीति में कूद पड़ीं।
1930 में दांडी यात्रा में भाग लिया
'भारत छोड़ो आंदोलन' में भागीदारी
अनेक बार जेल यात्राएँ
सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रमुख महिला नेता
वह उन विरल महिलाओं में थीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों से सीधे टकराकर जेल में दिन बिताए और फिर संविधान सभा में भारत के अधिकारों की रक्षा की पैरवी भी की।
🔶 महत्त्वपूर्ण कार्य
🏥 1. स्वास्थ्य मंत्री के रूप में योगदान (1947–1957)
भारत के स्वतंत्र होने पर नेहरू सरकार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं और उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय सौंपा गया।
AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) की स्थापना की प्रमुख सूत्रधार।
BCG टीकाकरण, मलेरिया नियंत्रण, टीबी उन्मूलन और मातृ-शिशु स्वास्थ्य योजनाओं की शुरुआत।
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (पटियाला) की स्थापना में योगदान।
“स्वस्थ राष्ट्र ही सशक्त राष्ट्र बन सकता है। स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं, आत्मा और समाज का भी होता है।”
– राजकुमारी अमृत कौर
🧕 2. महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार
1927 में ऑल इंडिया वीमेन कॉन्फ्रेंस (AIWC) की स्थापना में अग्रणी भूमिका।
बाल विवाह, पर्दा प्रथा और देवदासी प्रथा के विरोध में अभियान चलाए।
महिला शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के लिए निरंतर संघर्ष किया।
📜 3. संविधान सभा में योगदान
वे संविधान सभा की सदस्य थीं और मौलिक अधिकार समिति एवं अल्पसंख्यक उपसमिति की सदस्य भी रहीं।
धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता जैसे विचारों का उन्होंने पुरजोर समर्थन किया।
🔶 प्रेरणादायक उद्धरण
“मैं एक ईसाई हूं, पर मेरा राष्ट्रधर्म मुझे बताता है कि हर पीड़ित की सेवा, हर रोगी का उपचार, और हर अशिक्षित को प्रकाश देना ही सच्चा धर्म है।”
“महिलाओं को मत मांगने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें अधिकार उठाकर लेने होंगे — शिक्षालय से लेकर संसद तक।”
“AIIMS केवल अस्पताल नहीं है, यह भारत की स्वास्थ्य-आशा का मंदिर है।”
🔶 लेखन एवं सार्वजनिक अभिव्यक्ति
राजकुमारी अमृत कौर ने अनेक लेख, पत्र और भाषण लिखे। उनके पत्र गांधीजी को, उनके नोट्स स्वास्थ्य नीतियों पर, और महिला आंदोलन के लिए उनके वक्तव्य आज भी शोध और प्रेरणा का स्रोत हैं।
“Notes on Indian Women and Education”
“Gandhi and the Women of India”
“A New Health Vision for a New India” (स्वास्थ्य नीति पर उनके भाषण का अंश)
🔶 निधन और विरासत
6 फरवरी 1964 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने कोई निजी संपत्ति नहीं छोड़ी, पर एक विशाल मानवीय और वैचारिक धरोहर छोड़ दी। आज भी AIIMS, नई दिल्ली के एक भवन का नाम “Amrit Kaur Wing” है। उनकी स्मृति नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम, नई दिल्ली में संजोई गई है।
उसका कहना था कि “अगर कोई मुझे याद करे, तो एक सेविका के रूप में — जिसने अपनी मातृभूमि के लिए यथाशक्ति श्रम किया।” राजकुमारी अमृत कौर केवल एक राजघराने की संतान नहीं थीं — वे जनतंत्र की जननी, स्वास्थ्य की प्रहरी, नारी सशक्तिकरण की संवाहक और मानवतावाद की मूर्ति थीं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्म, जाति और वर्ग
की सीमाओं से ऊपर उठकर एक व्यक्ति कैसे राष्ट्र और मानवता की सेवा कर सकता है।
🈴🈴🈴🈴🈴
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी मूल्यवान टिप्पणीयों का सदैव स्वागत है......