पंचशील और पंचअश्लील
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नैतिक दर्शन, अपराध-वृत्ति और समकालीन समाज
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारतीय एवं वैश्विक नैतिक दर्शन में पंचशील की अवधारणा मानव-चरित्र निर्माण की आधारशिला रही है। बौद्ध दर्शन, जैन आचार-परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना में पंचशील—अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (व्यभिचार न करना), सत्य और नशामुक्त जीवन—को केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता के अनिवार्य तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है। डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में, “नैतिकता वह अनुशासन है जो व्यक्ति को समाज के योग्य बनाती है।”
इसके प्रतिलोम रूप में जब यही शील नकारे जाते हैं, तब वे पंचअश्लील का स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं—हिंसा, चोरी, व्यभिचार, असत्य और नशाखोरी। यह परिवर्तन केवल नैतिक पतन का संकेत नहीं, बल्कि अपराध-वृत्ति के उद्भव की प्रक्रिया को भी रेखांकित करता है।
समकालीन वैश्विक संदर्भों में चर्चित ‘एप्स्टीन फाइल’ जैसे प्रकरण इस तथ्य को उजागर करते हैं कि आधुनिक अपराध बहुधा सत्ता, धन, कामुकता और नशे के गठजोड़ से उत्पन्न होते हैं। अपराधशास्त्र (Criminology) के विद्वान एडविन सदरलैंड की Differential Association Theory यह स्पष्ट करती है कि अपराध सीखा जाता है—और यह सीख सामाजिक परिवेश में प्रचलित मूल्यों से सीधे जुड़ी होती है। यदि परिवेश पंचअश्लील प्रवृत्तियों को सामान्य बनाता है, तो अपराध स्वाभाविक परिणाम बन जाता है।
अपराधों के सूक्ष्म विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि शायद ही कोई जघन्य अपराध ऐसा हो, जिसमें पंचअश्लील के इन तत्वों में से कोई एक अनुपस्थित हो। प्रायः ये तत्व क्रमिक या संयुक्त रूप में उपस्थित होते हैं—
हिंसा चोरी को जन्म देती है,
चोरी झूठ को अनिवार्य बनाती है,
झूठ व्यभिचार को छिपाने का साधन बनता है,
और नशाखोरी विवेक तथा आत्मसंयम को पूर्णतः नष्ट कर देती है।
दुर्कीम (Émile Durkheim) ने इसे Anomie की स्थिति कहा—जहाँ सामाजिक मानदंड कमजोर पड़ जाते हैं और व्यक्ति नैतिक दिशाहीनता का शिकार हो जाता है। ऐसी स्थिति में अपराध केवल व्यक्तिगत विचलन नहीं रहता, बल्कि एक सामाजिक रोग बन जाता है।
यह भी स्वीकार्य तथ्य है कि ‘अश्लीलता’ के सामाजिक मापदंड विभिन्न संस्कृतियों और कालखंडों में भिन्न रहे हैं। मिशेल फूको ने सत्ता और नैतिकता के संबंध पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कई बार नैतिकता का प्रयोग भी सत्ता-संघर्ष और कूटनीतिक हथियार के रूप में किया जाता है। विरोधी को बदनाम करने, उसे नैतिक रूप से गिराने या जनमत को प्रभावित करने के लिए अश्लीलता के तत्वों का रणनीतिक उपयोग होता रहा है। किंतु इससे अश्लीलता की मूल प्रवृत्तियाँ निर्दोष नहीं हो जातीं—उनका सामाजिक दुष्परिणाम बना रहता है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या अपराध-नियंत्रण केवल कानून, पुलिस और दंड-विधान से संभव है? महात्मा गांधी का स्पष्ट मत था कि “बिना चरित्र के कानून समाज को सुरक्षित नहीं बना सकता।” कानून बाह्य नियंत्रण है, जबकि पंचशील आंतरिक अनुशासन का निर्माण करता है।
जीवन में पंचशीलों का पालन व्यक्ति को आत्मसंयम, विवेक और उत्तरदायित्व की ओर उन्मुख करता है। यही आंतरिक नैतिकता अश्लील प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करती है। जब शील जीवन का स्वभाव बन जाते हैं, तब अपराध का मार्ग स्वतः अवरुद्ध हो जाता है।
अतः अपराध-मुक्त समाज की परिकल्पना केवल विधिक ढांचे पर आधारित नहीं हो सकती। इसके लिए शिक्षा, परिवार, मीडिया और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से पंचशील को पुनः जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करना अनिवार्य है। पंचशील केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए एक व्यावहारिक और अपरिहार्य नैतिक संरचना है। पंचअश्लील से मुक्ति का मार्ग अंततः पंचशील के पुनर्स्था
पन से होकर ही जाता है।
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