13 जनवरी 2026

चाय : एक राष्ट्रीय लत की आत्मकथा



✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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कभी चाय बहुत शरीफ़ हुआ करती थी। वह हर समय उपलब्ध नहीं रहती थी, न ही हर घर की सदस्य थी। बचपन में चाय मौसम देखकर आती थी—वह भी केवल जाड़ों में। गर्मियों में चाय का नाम लेना बदतमीज़ी माना जाता था। तब चाय न सर्वकालिक थी, न सर्वव्यापी और न ही सर्वशक्तिमान। आज चाय हर जगह है—बस भगवान के मंदिर में ही शेष है, वहाँ भी प्रसाद के रूप में पहुँचने की कोशिश में है।


उन दिनों एक कप चाय दस पैसे में मिल जाती थी—पूरे दस पैसे में। आज इतने में चायवाला कप भी न दिखाए। तब एक कप चाय में स्वाद भी होता था और मात्रा भी। आज उसी मात्रा से चार कप बन जाते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले चाय होती थी, अब उसका ट्रेलर चलता है। महँगाई अब चाय से नहीं, चाय पीने वालों की सहनशक्ति से मापी जाती है।


मेरी नानी बताया करती थीं कि अंग्रेज़ों के ज़माने में ‘लिपटन-टी’ वाले चौराहों पर बड़े कंटेनरों में मुफ्त चाय बाँटते थे। अंग्रेज चालाक थे—वे जानते थे कि एक बार भारतीयों को चाय की आदत लग गई, तो राज भले चला जाए, चाय का साम्राज्य नहीं जाएगा। यह इतिहास भले किताबों में न हो, पर हर कप में दर्ज है।


आज चाय पीने वाला साधारण नागरिक नहीं रहा, वह ‘टी-लवर’ हो गया है। जैसे शराब पीने वाला शराबी कहलाता है, वैसे ही दिन में पाँच बार चाय पीने वाला गर्व से खुद को टी-लवर कहता है। ‘चायाबी’ शब्द हमें देसी लगता है, इसलिए हमने अपनी लत को अंग्रेज़ी पहनाकर सामाजिक मान्यता दे दी है। आदत अब शौक नहीं, स्टेटस बन चुकी है।


पहले अतिथि के सामने पान रखा जाता था। पान न मिले तो भी संबंध चलते रहते थे। आज चाय न मिले तो संबंधों में खटास आ जाती है। पान छोड़ दिया गया, पर चाय अनिवार्य कर दी गई। कई रिश्ते तो अब केवल “चाय पर आइए” के भरोसे चल रहे हैं।


आज चाय की कीमत चाय से ज़्यादा उसके पात्र पर निर्भर करती है। चाय वही रहती है—बस कप बदलते ही रेट बदल जाते हैं।

 डिस्पोज़ल कप में सस्ती,

 मिट्टी के कुज्जे में महँगी,

 काँच में इज़्ज़तदार और

 स्टील में पूरी तरह सरकारी।

थैली में बंद चाय पीकर आदमी तय नहीं कर पाता कि उसने चाय पी है या कोई पैथोलॉजी रिपोर्ट।


डॉक्टर कहते हैं—“चाय कम पीजिए, यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” टी-लवर मुस्कराकर जवाब देता है—“डॉक्टर साहब, ज़हर नहीं है…ज़िंदगी है। बस दो घूँट और।”


सत्तर के दशक की दस पैसे वाली चाय आज तीस रुपये की हो चुकी है। चाय महँगी नहीं हुई—हम सस्ते हो गए हैं। स्वाद गया, मात्रा गई, स्वास्थ्य गया—बस आदत बची है। घर हो या दफ़्तर, बस अड्डा हो या रेलगाड़ी—“चाय गरम है!” की आवाज़ सुनते ही नींद टूट जाती है और तलब जाग उठती है।


अब चाय केवल पेय नहीं रही, वह सामाजिक मजबूरी बन चुकी है। और हम सब, जाने-अनजाने, गर्व से चायाबी बने बैठे हैं—हाथ में कप, होंठों पर मुस्कान और मन में अगली चाय की प्रतीक्षा। सच यही है कि चाय ने हमें नहीं अपनाया— हमने ही अपने विवेक का आत्मसमर्पण उसके हाथों में कर 

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सत्य और उसके समग्र आयाम


✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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सत्य वही नहीं होता जो किसी एक क्षण या एक दृष्टि से दिखाई दे जाए। वह अनुभव, स्थान, समय और दृष्टिकोण के साथ अलग- अलग रूपों में प्रकट होता है। इसी कारण सत्य को समझने के लिए समग्र दृष्टि की आवश्यकता होती है।



सन् 1970 में मैं दिल्ली गया था और वहाँ स्थित कुतुबमीनार को देखने का अवसर मिला। उस समय पर्यटकों को मीनार की पाँचवीं मंज़िल तक जाने की अनुमति थी। ऊपर पहुँचकर जो दृश्य दिखाई देता था, वह नीचे खड़े दर्शक की कल्पना से कहीं अधिक विस्तृत और भिन्न होता था। आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं; कुछ दुर्घटनाओं के बाद ऊपर जाने का मार्ग बंद कर दिया गया। अब पर्यटक उस अनुभव को केवल सुन या पढ़ सकते हैं, देख नहीं सकते।



इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि एक ही वस्तु या घटना को देखने वाले सभी लोगों को एक जैसा दृश्य प्राप्त नहीं होता। जो व्यक्ति ऊँचाई पर खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न है और जो नीचे खड़ा है, उसका अनुभव भिन्न। वस्तुतः एक ही समय में सभी फलक दृश्य-मान नहीं होते।



भूतकाल की घटनाएँ इतिहास बन जाती हैं। उन्हें हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते, केवल पढ़कर या सुनकर उनका अनुमान लगाते हैं। भविष्य अभी आया नहीं है, उसकी केवल कल्पना की जा सकती है। वर्तमान भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके स्थान और दृष्टिकोण के अनुसार अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। इस प्रकार दृष्टिकोण बदलने से नज़ारा बदल जाता है।



यही कारण है कि एकांगी दृष्टिकोण अपनाने से पूर्ण सत्य का बोध असंभव हो जाता है। किसी भी वस्तु, विचार या घटना को समझने के लिए उसके सभी पक्षों का समग्रता से आकलन आवश्यक होता है।



भारतीय दर्शन में इस सत्य को जैन दर्शन ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया है। जैन दर्शन में सत्य की समग्र अनुभूति को स्यादवाद से जोड़ा गया है। स्यादवाद यह स्वीकार करता है कि सत्य बहुआयामी होता है। कोई भी कथन पूर्ण रूप से तभी सत्य हो सकता है, जब उसे विभिन्न अपेक्षाओं और दृष्टिकोणों से देखा जाए। प्रत्येक कथन ‘स्यात्’— अर्थात् किसी विशेष संदर्भ में—सत्य होता है, किंतु वही अंतिम और पूर्ण सत्य नहीं होता।



जिस प्रकार कुतुबमीनार की ऊँचाई से दिखाई देने वाला दृश्य नीचे खड़े व्यक्ति को उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार सत्य भी केवल एक दृष्टि से पूर्ण रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता। अनेक दृष्टियों का समन्वय ही सत्य की वास्तविक पहचान कराता है।



अतः यह स्पष्ट है कि सत्य न तो केवल देखा जा सकता है और न ही एकांगी रूप से समझा जा सकता है। सत्य वास्तव में समग्रता का बोध है—जो अनुभव, समय, स्थान और दृष्टिकोण के संतुलित समन्वय से ही संभव हो पाता है।

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खेल की भावना बनाम कट्टरता


✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज को जोड़ने वाला एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु है। खेल मैदान वह स्थान है जहाँ भाषा, धर्म, जाति, नस्ल और राष्ट्रीय सीमाएँ गौण हो जाती हैं और मानव प्रतिभा तथा परिश्रम ही सर्वोपरि होता है। इसी कारण कहा जाता है कि खेलों का धर्म केवल खेल की भावना है।



खेल की भावना का अर्थ



खेल की भावना का आशय निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, नियमों के प्रति सम्मान, प्रतिद्वंद्वी के प्रति गरिमा और जीत–हार को सहज रूप से स्वीकार करने से है। खेल हमें अनुशासन, टीम-वर्क, सहिष्णुता और आत्मसंयम सिखाते हैं। यही मूल्य खेलों को समाज-निर्माण का सशक्त माध्यम बनाते हैं।



खेलों में कट्टरता का बढ़ता प्रवेश



दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में खेलों में धर्म, जाति और नस्ल आधारित कट्टरता का प्रवेश एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। खिलाड़ी अब कई बार अपने खेल से अधिक अपनी पहचान के कारण चर्चा में आ जाते हैं। दर्शकों के नारे, सोशल मीडिया पर टिप्पणियाँ और यहाँ तक कि चयन प्रक्रिया में पक्षपात—ये सभी खेल की मूल आत्मा को आहत करते हैं।



नस्ल और रंगभेद : इतिहास की चेतावनी



इतिहास साक्षी है कि जब खेलों में नस्ल और रंगभेद हावी हुए, तब खेल को वैश्विक अपमान का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका का रंगभेदी दौर इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जब अंतरराष्ट्रीय दबाव के बिना वहाँ खेलों में समानता की कल्पना भी संभव नहीं थी। यह अनुभव हमें सिखाता है कि खेल में भेदभाव को “आंतरिक मामला” मानकर अनदेखा करना घातक हो सकता है।



खेल समाज का दर्पण



खेल समाज का आईना होते हैं। यदि समाज में कट्टरता, असहिष्णुता और विभाजन बढ़ता है, तो उसका प्रतिबिंब खेल मैदान में भी दिखाई देता है। परंतु यही खेल समाज को सही दिशा देने का माध्यम भी बन सकते हैं। एक टीम में विभिन्न धर्मों, जातियों और नस्लों के खिलाड़ी मिलकर खेलें—यह दृश्य अपने आप में सामाजिक समरसता का संदेश देता है।



समाधान और सामूहिक जिम्मेदारी



खेलों को कट्टरता से मुक्त रखने के लिए खेल संस्थाओं, सरकारों, मीडिया और दर्शकों—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। भेदभाव के विरुद्ध सख्त नियम, नैतिक शिक्षा, संवेदनशील मीडिया कवरेज और दर्शकों का जिम्मेदार व्यवहार आवश्यक है। खिलाड़ियों को भी यह समझना होगा कि वे केवल खिलाड़ी नहीं, बल्कि समाज के प्रेरक प्रतीक हैं।



निष्कर्ष



खेलों को खेल की भावना से खेला जाना चाहिए—यही उनका सार और सौंदर्य है। जब खेल मैदान भेदभाव और कट्टरता से मुक्त होता है, तभी वह मानवता के मूल मूल्यों—समानता, भाईचारे और सम्मान—को सशक्त करता है। यदि खेल हार गया, तो केवल एक मैच नहीं हारेगा, बल्कि समाज अपने भविष्य की एक उज्ज्वल संभावना खो देगा।

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समय : घड़ी नहीं, मन का शरारती रिश्तेदार

 समय : घड़ी नहीं, मन का शरारती रिश्तेदार

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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समय बड़ा विचित्र प्राणी है। घड़ी में तो वह बड़ी ईमानदारी से टिक-टिक करता रहता है, पर हमारे मन में आते ही उसका चरित्र बदल जाता है। जैसे ही मनोदशा बदली, समय ने भी कपड़े बदल लिए। कभी वह कछुए की चाल चलता है, तो कभी खरगोश को भी मात दे देता है।


जब आप किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं—विशेषकर उस व्यक्ति की, जो “बस पाँच मिनट में पहुँच रहा हूँ” कहकर आधे घंटे बाद आता है—तब समय ऐसा सुस्त हो जाता है मानो उसे सरकारी नौकरी मिल गई हो। सेकेंड मिनट बन जाते हैं और मिनट युग में बदल जाते हैं। घड़ी की सुइयाँ मानो कहती हैं—“आज मूड नहीं है, कल चलेंगे।”



इसके ठीक उलट, जब आपको देर हो रही होती है, तब समय अचानक ओलंपिक का धावक बन जाता है। नहाने के लिए गए और बाहर निकले तो पता चला—समय आपसे आगे निकल चुका है। बस छूट चुकी है, ट्रेन आँखों से ओझल है और समय आपको पीछे खड़े होकर मुस्कुरा रहा है—“अब बताओ, कितने बजे की घड़ी पहन रखी है?”



दुख की अवस्था में समय का व्यवहार सबसे निर्दयी हो जाता है। वह न आगे बढ़ता है, न पीछे हटता है—बस वहीं खड़ा होकर आपको घूरता रहता है। लगता है मानो उसने शपथ ले ली हो कि आज वह हिलेगा ही नहीं। हर पल भारी, हर क्षण बोझिल— समय नहीं, कोई पत्थर सीने पर रखा हो ऐसा लगता है।



इसके विपरीत, प्रसन्नता के क्षणों में समय बड़ा चालाक निकलता है। आप हँसते- खेलते हैं और समय चुपचाप निकल जाता है। पता ही नहीं चलता कि कब घंटा बीत गया। तब हम कहते हैं—“अरे, समय का पता ही नहीं चला!” वास्तव में समय का पता नहीं चला, क्योंकि वह बिना बताए भाग गया।




और जब आप ऊब रहे होते हैं, तब समय की लंबाई बढ़ जाती है। पाँच मिनट की बैठक पाँच घंटे की लगती है। भाषण छोटा हो या लंबा, ऊब की अवस्था में हर सेकेंड “दीर्घकालीन योजना” बन जाता है। तब समय नहीं, धैर्य की परीक्षा चल रही होती है।



कष्ट में समय का असली चेहरा सामने आता है। वह न कटता है, न घटता है। घड़ी देखो तो वही मिनट, दोबारा देखो तो वही मिनट। ऐसा लगता है जैसे समय आपको चिढ़ाने के लिए वहीं बैठ गया हो—“क्या कर लोगे? मैं यहीं हूँ!”



अंततः निष्कर्ष बड़ा स्पष्ट है—समय वैसा नहीं होता जैसा घड़ी दिखाती है, समय वैसा होता है जैसा मन महसूस कराता है। घड़ी तो बस बहाना है; असली खेल मनोदशा का है। इसलिए अगली बार अगर समय तेज या धीमा लगे, तो घड़ी को दोष मत दीजिए— मन से पूछिए, आज उसका मूड कैसा है।

क्योंकि समय बदलना कठिन है, पर मन बदल जाए तो समय अपने 

आप बदल जाता है।

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आलू : मिट्टी से थाली तक की एक यात्रा

 

आलू : मिट्टी से थाली तक की एक यात्रा

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✍🏻 डॉ, डंडा लखनवी 

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आज हमारी रसोई में यदि कोई सब्ज़ी सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, तो वह आलू है। अमीर की थाली में भी वही आलू दमकता है और गरीब की रोटी के साथ भी वही सहारा बनता है। अकेले भी वह सम्पूर्ण है और दूसरी सब्ज़ियों के साथ मिलकर भी अपनी पहचान नहीं खोता। इसीलिए लोकजीवन ने उसे ससम्मान “सब्ज़ियों का राजा” कहा जाता है। परंतु यह राजा जन्म से राजसिंहासन पर नहीं बैठा था। इसका इतिहास उतना ही रोचक है जितना इसका स्वाद।



आलू की जन्मभूमि दक्षिण अमेरिका मानी जाती है—पेरू और बोलीविया के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र। वहाँ के आदिवासी समुदायों ने हज़ारों वर्ष पहले इस साधारण-सी दिखने वाली कंद सब्ज़ी को पहचाना, अपनाया और अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया। पहाड़ों की ठंडी मिट्टी में उगने वाला आलू वहाँ जीवन-रक्षक था—ऊर्जा भी देता था और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहता था।



सोलहवीं शताब्दी में जब यूरोपीय खोजी संसार को नापने निकले, तब आलू भी जहाज़ों पर सवार होकर नए महाद्वीपों की ओर चल पड़ा। स्पेन के रास्ते वह यूरोप पहुँचा, पर प्रारंभ में उसे संदेह की दृष्टि से देखा गया। ज़मीन के नीचे पैदा होने वाली इस चीज़ को कई लोग अशुभ मानते थे। कुछ ने तो इसे बीमारी का कारण तक समझ लिया। पर समय के साथ आलू ने अपने गुणों से सभी शंकाओं को पराजित कर दिया। धीरे-धीरे वह यूरोप की थाली में स्थायी अतिथि बन गया।



भारत में आलू के आगमन का श्रेय प्रायः पुर्तगाली व्यापारियों को दिया जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में वे इसे अपने साथ लेकर आए। आरंभ में आलू शाही रसोई और अंग्रेज़ अफसरों की मेज़ तक सीमित रहा, पर भारतीय मिट्टी ने इसे तुरंत अपना लिया। गंगा–यमुना के मैदान हों या दक्कन का पठार—आलू हर जगह सहजता से उग आया।



भारतीय समाज में आलू का इतिहास केवल खेती का इतिहास नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता की कथा भी है। जाति, वर्ग और क्षेत्र की सीमाएँ तोड़ते हुए आलू हर रसोई में प्रवेश कर गया। व्रत में भी आलू चलता है, साधु की झोली में भी और उत्सव की थाली में भी। सब्ज़ी कम हो तो आलू काम आ जाता है, मेहमान अधिक हों तो भी वही सहारा बनता है।



आलू ने भारतीय व्यंजनों को नई पहचान दी—आलू की सब्ज़ी, दम आलू, आलू पराठा, समोसा, टिक्की और न जाने कितने रूप। उसने स्वाद के साथ-साथ पेट और बजट—तीनों का संतुलन साधा।



आज आलू केवल एक सब्ज़ी नहीं, बल्कि समय का साक्ष्य है। वह बताता है कि कैसे एक विदेशी कंद भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। मिट्टी में जन्मा, समुद्र पार से आया और थाली में नायक बन गया— देश-देशांतरों के बीच आलू की़ यात्रा मनुष्य की अनुकूलनशीलता और भोजन की सांस्कृतिक शक्ति की कहानी भी है।



इसलिए जब अगली बार रसोई में आलू हाथ में आए, तो उसे साधारण न समझिए। उसके भीतर इतिहास भी है, भूगोल भी और लोकजीवन की आत्मा जुड़ी है।

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