नेताजी सुभाष चंद्र बोस
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संकल्प, साहस और स्वाधीनता के ज्वलंत प्रतीक
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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23 जनवरी भारतीय इतिहास की एक साधारण तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, आत्मसम्मान और निर्भीक संघर्ष का स्मरण-पर्व है। इसी दिन 1897 में कटक (उड़ीसा) में जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वह प्रखर ऊर्जा प्रदान की, जिसने औपनिवेशिक दासता की जड़ों को हिला दिया। वे केवल स्वतंत्रता संग्राम के एक अध्याय नहीं, बल्कि उस चेतना के प्रतीक हैं, जिसने भारत को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में देखने का स्वप्न संजोया।
नेताजी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम विचारों तक सीमित नहीं होता, वह कर्म और अनुशासन की कठोर साधना है। आई.सी.एस. जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्यागने का उनका निर्णय केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं था, बल्कि विदेशी शासन के प्रति नैतिक अस्वीकार का उद्घोष था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया कि राष्ट्र की अस्मिता किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से ऊपर है।
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—
यह नारा भावनात्मक उन्माद नहीं, बल्कि एक सुस्पष्ट रणनीतिक आह्वान था। नेताजी का विश्वास था कि स्वतंत्रता याचना से नहीं, बल्कि संगठन, त्याग और निर्णायक संघर्ष से प्राप्त होती है। इसी विश्वास ने 1943 में आज़ाद हिंद फ़ौज और आज़ाद हिंद सरकार के गठन को जन्म दिया। “दिल्ली चलो” का उनका उद्घोष उस समय असंभव प्रतीत होता था, किंतु नेताजी ने सिद्ध किया कि इतिहास वही रचते हैं, जो असंभव को संभव मानने का साहस रखते हैं।
अनुशासन और राष्ट्रनिर्माण का दृष्टिकोण
नेताजी केवल एक क्रांतिकारी सेनानायक नहीं थे, वे एक दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता भी थे। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब वह सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और अनुशासन से जुड़ी हो। वे धर्म, जाति और भाषा के भेदों से ऊपर उठकर भारतीयता की समावेशी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं।
उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ मात्र सत्ता-हस्तांतरण नहीं था, बल्कि—
आर्थिक आत्मनिर्भरता
सामाजिक समानता
और आत्मसम्मान से युक्त राष्ट्रीय चरित्र
का निर्माण था। इस दृष्टि से वे अपने समय से कहीं आगे खड़े दिखाई देते हैं।
समकालीन संदर्भ में नेताजी
आज, स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस हमें आत्ममंथन के लिए विवश करते हैं। क्या हम अपनी स्वतंत्रता के प्रति उतने ही सजग हैं? क्या राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर रखने का साहस हमारे भीतर शेष है?
नेताजी का जीवन विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। वे सिखाते हैं कि साहस बिना संकल्प अधूरा है और संकल्प बिना कर्म खोखला। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब राष्ट्र को चरित्रवान, जागरूक और उत्तरदायी नागरिकों की आवश्यकता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस अमर हैं—अपने विचारों में, अपने संघर्ष में और उस स्वप्न में, जिसमें भारत आत्मनिर्भर, एकजुट और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हो। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके आदर्शों को अपने आचरण और सामाजिक जीवन में उतारने का संकल्प लें।
नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम इतिहास का पाठ न बनें, बल्कि इतिहास गढ़ने का साहस रखें।
जय हिंद! 🇮🇳