02 फ़रवरी 2026

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

 नेताजी सुभाष चंद्र बोस

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संकल्प, साहस और स्वाधीनता के ज्वलंत प्रतीक

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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23 जनवरी भारतीय इतिहास की एक साधारण तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, आत्मसम्मान और निर्भीक संघर्ष का स्मरण-पर्व है। इसी दिन 1897 में कटक (उड़ीसा) में जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वह प्रखर ऊर्जा प्रदान की, जिसने औपनिवेशिक दासता की जड़ों को हिला दिया। वे केवल स्वतंत्रता संग्राम के एक अध्याय नहीं, बल्कि उस चेतना के प्रतीक हैं, जिसने भारत को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में देखने का स्वप्न संजोया।

नेताजी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम विचारों तक सीमित नहीं होता, वह कर्म और अनुशासन की कठोर साधना है। आई.सी.एस. जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्यागने का उनका निर्णय केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं था, बल्कि विदेशी शासन के प्रति नैतिक अस्वीकार का उद्घोष था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया कि राष्ट्र की अस्मिता किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से ऊपर है।

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—

 यह नारा भावनात्मक उन्माद नहीं, बल्कि एक सुस्पष्ट रणनीतिक आह्वान था। नेताजी का विश्वास था कि स्वतंत्रता याचना से नहीं, बल्कि संगठन, त्याग और निर्णायक संघर्ष से प्राप्त होती है। इसी विश्वास ने 1943 में आज़ाद हिंद फ़ौज और आज़ाद हिंद सरकार के गठन को जन्म दिया। “दिल्ली चलो” का उनका उद्घोष उस समय असंभव प्रतीत होता था, किंतु नेताजी ने सिद्ध किया कि इतिहास वही रचते हैं, जो असंभव को संभव मानने का साहस रखते हैं।


अनुशासन और राष्ट्रनिर्माण का दृष्टिकोण

नेताजी केवल एक क्रांतिकारी सेनानायक नहीं थे, वे एक दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता भी थे। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब वह सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और अनुशासन से जुड़ी हो। वे धर्म, जाति और भाषा के भेदों से ऊपर उठकर भारतीयता की समावेशी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं।

उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ मात्र सत्ता-हस्तांतरण नहीं था, बल्कि—

आर्थिक आत्मनिर्भरता



सामाजिक समानता



और आत्मसम्मान से युक्त राष्ट्रीय चरित्र



का निर्माण था। इस दृष्टि से वे अपने समय से कहीं आगे खड़े दिखाई देते हैं।


समकालीन संदर्भ में नेताजी

आज, स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस हमें आत्ममंथन के लिए विवश करते हैं। क्या हम अपनी स्वतंत्रता के प्रति उतने ही सजग हैं? क्या राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर रखने का साहस हमारे भीतर शेष है?

नेताजी का जीवन विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। वे सिखाते हैं कि साहस बिना संकल्प अधूरा है और संकल्प बिना कर्म खोखला। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब राष्ट्र को चरित्रवान, जागरूक और उत्तरदायी नागरिकों की आवश्यकता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अमर हैं—अपने विचारों में, अपने संघर्ष में और उस स्वप्न में, जिसमें भारत आत्मनिर्भर, एकजुट और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हो। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके आदर्शों को अपने आचरण और सामाजिक जीवन में उतारने का संकल्प लें।

नेताजी को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम इतिहास का पाठ न बनें, बल्कि इतिहास गढ़ने का साहस रखें।

जय हिंद! 🇮🇳


एक प्राणी का दुखड़ा

 मुहावरों की मार से कराहती

एक प्राणी का दुखड़ा 

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✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी 

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आज मैं आपके सामने न किसी सरकार की शिकायत लेकर आया हूँ,

न विपक्ष की—

आज मैं आवाज़ बना हूँ

उस प्राणी की जो इस देश में सबसे ज़्यादा बदनाम है,

और सबसे ज़्यादा दूध देती है—

मेरा मतलब–भैंस!


आप ज़रा सोचिए—

बच्चा पैदा होते ही

दूध किसका पीता है?

भैंस का!


और वह भी—

बोर्नवीटा डाल-डाल कर,

कॉम्प्लान मिलाकर,

बादाम घिसकर!


लेकिन जैसे ही बच्चा

कॉपी-किताब के लायक होता है,

निबंध लिखवाया जाता है—


“गाय पर निबंध लिखो।”

“हाथी पर निबंध लिखो।”

“कुत्ते पर निबंध लिखो।”


भैंस पर क्यों नहीं?

क्या भैंस पर लिखने से

मार्क्स कम हो जाते हैं?

या परीक्षक को लगता है—

भैंस विषय नहीं, सज़ा है!


और अगर बच्चा लिख न पाए,

तो तुरंत फ़तवा जारी—

“काला अक्षर भैंस बराबर!”


अरे भाई!

तो फिर बताइए—

काला अक्षर हाथी बराबर क्यों नहीं?

या कुत्ता बराबर क्यों नहीं?


क्या बाकी जानवर

जेएनयू से पढ़े हैं,

और भैंस किसी प्राइवेट कॉलेज से?


कोई आदमी ज़रा-सी गलती कर दे,

तो समाज का निर्णय तुरंत आता है—

“गई भैंस पानी में!”


अब मेरा सीधा-सा सवाल है—

बाकी जानवर कहाँ जाते हैं?


क्या गाय गंगा में जाती है?

हाथी स्विमिंग पूल में?

और कुत्ता…

कोका-कोला में?


और अगर कोई समझाने पर भी न समझे,

तो कहा जाता है—

“भैंस के आगे क्या बीन बजाना।”


तो बाकी के आगे क्या बजाते हैं?

शास्त्रीय संगीत?

ग़ज़ल?

या सीधे राष्ट्रीय गीत?


इतनी बदनामी कम थी कि

अब आलस का भी ठीकरा

भैंस के सिर पर फोड़ दिया—


“भैंस चरने भेज दो!”


अरे साहब,

भैंस चराना इतना आसान होता

तो आधी बेरोज़गारी

उसी दिन खत्म हो जाती!


कम से कम भैंस को यह तो पता है

कि घास खानी है—

इंसान को तो यह भी नहीं पता

कि सच बोलना है या ट्वीट करना है!


(तालियों का इंतज़ार करते हुए)


और सबसे मज़ेदार बात सुनिए—

भैंस को हमने

न मूर्ख होने का हक़ दिया,

न समझदार होने का!


समझदार होती तो—

“चालाक भैंस” कहते,

मूर्ख होती तो—

“बेचारी भैंस” कहते।


लेकिन नहीं!

भैंस तो बस

मुहावरों की कुल्फी है—

जिसे हर कोई चाटता है!


(स्वर बदलकर, गंभीर व्यंग्य)


एक दिन भैंस ने सोचा—

अगर मैं गाय होती,

तो आज मंदिर में होती।


अगर मैं कुत्ता होती,

तो घर के सोफ़े पर होती।


अगर मैं हाथी होती,

तो सरकारी जुलूसों में होती।


लेकिन मैं भैंस हूँ—

इसलिए

हर ग़लती का ठप्पा 

मेरे नाम पर लगता है!


(समापन की ओर, तीखा प्रहार)


ध्यान दीजिए—

दूध भैंस देती है,

घी भैंस देती है,

मक्खन भैंस देती है—

और गालियाँ?

वह भी भैंस ही खाती है!


शायद इसलिए

क्योंकि भैंस चुप रहती है, बोलती नहीं,


लेकिन जिस दिन भैंस बोल पड़ी न—

उस दिन भाषा-विज्ञान की सा

री किताबें

पानी में चली जाएँगी…


और तब कोई कहेगा—

“गई भैंस पानी में!”


धन्यवाद! 🙏

(अब आप ताली बजाइए—

भैंस के सम्मान में!)

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पंचशील और भारतीय संस्कृति

 पंचशील और भारतीय संस्कृति

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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किसी भी सभ्यता की आत्मा उसके महान व्यक्तियों के आचरण में प्रतिबिंबित होती है। संस्कृति केवल रीति-रिवाजों या परंपराओं का समुच्चय नहीं होती, बल्कि वह नैतिक मूल्यों और सदाचारों की जीवंत अभिव्यक्ति होती है। एक समय था जब भारतीय संस्कृति का संसार में विशेष मान था। तथागत बुद्ध की करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग की शिक्षाएँ एशिया के विशाल भूभाग में गूंज रही थीं। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालय ज्ञान के आलोक-स्तंभ थे। उस काल में भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व का केंद्र था।


इस गौरवशाली परंपरा के मूल में पंचशील का अनुशासित पालन निहित था। पंचशील—सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—केवल बौद्ध दर्शन की देन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। इनका पालन करने वाला व्यक्ति निष्कलुष, संयमी और न्यायप्रिय माना जाता था। यही कारण है कि समाज में ऐसे ही व्यक्तियों को नेतृत्व और न्याय की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ‘सरपंच’ की अवधारणा भी इसी नैतिक चेतना से जुड़ी मानी जाती है—अर्थात वह व्यक्ति जो शीलों का प्रधान हो।


दुर्भाग्यवश, आधुनिक समय में पंचशील का अर्थ और महत्व जनसामान्य की स्मृति से ओझल होता जा रहा है। सामाजिक जीवन के प्रायः हर क्षेत्र में पाखंड, छल और अवसरवाद का विस्तार दिखाई देता है। सत्य के स्थान पर सुविधा, संयम के स्थान पर उपभोग और नैतिकता के स्थान पर स्वार्थ ने पैर पसार लिए हैं। शील अर्थात सदाचार का जीवन में सर्वोपरि महत्व है—सत्य बोलना, चोरी न करना, मादक पदार्थों से परहेज, नारी के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि और छल-प्रपंच से दूरी—ये सभी मूल्य किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं हैं। ये तो मानवता की साझा धरोहर हैं।


इतिहास साक्षी है कि अंग्रेज जहाँ-जहाँ गए, वहाँ की संस्कृतियों की उपयोगी विशेषताओं को आत्मसात कर उन्होंने स्वयं को सुदृढ़ किया। भारत से भी उन्होंने बहुत कुछ सीखा और समयबद्धता, अनुशासन तथा संस्थागत नैतिकता के बल पर आगे बढ़े। विडंबना यह रही कि हमने उनके खान-पान, रहन-सहन और बाह्य आडंबरों की नकल तो की, किंतु उनके अनुशासन, समयपालन और नैतिक कार्यसंस्कृति को अपनाने में संकोच दिखाया। केवल अनुकरण किसी समाज को उन्नत नहीं बनाता; आवश्यक है मूल्यों का आत्मसात।


यह भी आत्ममंथन का विषय है कि आंतरिक नैतिक दुर्बलताओं और सामाजिक विघटन ने भारत को पराधीनता की ओर धकेला। जब सदाचार शिथिल होता है, तब बाहरी शक्तियाँ अवसर खोज ही लेती हैं। अतः आज आवश्यकता है पंचशील को अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा के रूप में पुनर्स्थापित करने की।


यदि भारत को सामाजिक शांति, नैतिक सुदृढ़ता और वैश्विक सम्मान की ओर अग्रसर होना है, तो पंचशील को व्यक्तिगत आचरण से लेकर सार्वजनिक जीवन तक पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। पंचशील केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सभ्य समाज की शर्त है। इन्हीं मूल्यों के पुनर्जागरण में भारत की सांस्कृतिक पुनर्निर्मिति और मानवीय भविष्य निहित है।

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परिष्कृत संस्करण

 : पुनर्प्रकाशित


रुपया! तू बड़ा बहुरूपिया

 रुपया! तू बड़ा बहुरूपिया 

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

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रुपया इस देश का सबसे सफल अभिनेता है। इसे न कोई राष्ट्रीय पुरस्कार चाहिए, न अभिनय विद्यालय—हर दृश्य में फिट, हर भूमिका में हिट। हालात बदलते ही इसका नाम, काम और चरित्र बदल जाता है। चरित्रहीन मनुष्य बदनाम होता है, पर चरित्रहीन रुपया व्यवस्था कहलाता है।



बैंक में जब रुपया लौटने से इनकार कर देता है, तो उसे चोर नहीं कहा जाता—उसे सम्मानजनक उपाधि मिलती है एनपीए। यह वह अवस्था है जहाँ रुपया मर जाता है, लेकिन काग़ज़ों में ज़िंदा रहता है। मंदिर पहुँचते ही वही रुपया पाप धोने की मशीन बन जाता है—डालो चढ़ावा, निकालो पुण्य। पुजारी जी के हाथ में आते ही उसका नाम बदलकर दक्षिणा हो जाता है—ईश्वर का रास्ता हमेशा कैश काउंटर से होकर जाता है।



सड़क किनारे वही रुपया भीख कहलाता है—देने वाले की दया और लेने वाले की विवशता का सिक्का। महलों में वही सिक्का नज़राना बनकर गर्व से झुकता है। लोकतंत्र में आकर रुपया पूरी तरह बेलगाम हो जाता है—कहीं विधायक निधि, कहीं सांसद निधि—नाम विकास का, काम फाइलों का।



नौकरी के अंत में वही रुपया पेंशन बनकर जीवन रेखा कहलाता है, और अपराधियों के हाथ लगते ही फिरौती बनकर जीवन का मूल्य तय करता है—आजकल जान की कीमत बाजार भाव से चलती है।



स्कूल में पहुंचकर रुपया फ़ीस बन जाता है —ज्ञान से पहले जमा, सवाल बाद में। शादी में वही रुपया दहेज बनकर रिश्तों की नीलामी करता है। किसी के पास ईमानदारी से रखा जाए तो धरोहर, और अगर रिश्ते टूट जाएँ तो वही रुपया गुज़ारा भत्ता बनकर ‘इंसाफ़’ की औपचारिक रसीद थमा देता है।



कचहरी में रुपया प्रतिभूति बनकर भरोसे की कीमत तय करता है। ज़रूरत में कर्ज़, और लौटाने की बारी आए तो वही कर्ज़ सरदर्द बन जाता है। दानवीर का दान वही है जो दिखे, और हर्जाना, जुर्माना वही जो चुभे। सरकार के पास जाए तो कर, और जनता के पास पहुँचे तो चमत्कार।



होटल में वही रुपया टिप बनकर सम्मान पाता है, बैंक में ऋण बनकर आज़ादी छीनता है, और समय के साथ ब्याज बनकर खून चूसता है। दफ़्तर में वही रुपया वेतन कहलाता है—जो महीने के अंत तक आते- आते इतिहास बन जाता है। भत्ते के रूप में रुपया वे सपने हैं, जो पर्चियों में पूरे होते हैं।



लेखक को वही रुपया पारिश्रमिक बनकर ‘मान’ देता है, और मज़दूर को मज़दूरी बनकर ‘काम चलाऊ जीवन’। बीमा कंपनी के लिए वह प्रीमियम, मकान मालिक के लिए किराया, और भ्रष्ट अफ़सर के लिए वही पुराना परिचित—रिश्वत।



साल में एक बार वही रुपया बोनस बनकर उम्मीद जगाता है, सौदे में बयाना बनकर फँसाता है, और अपराध की दुनिया में सुपाड़ी बनकर इंसानियत को रगड़ देता है।



धर्म भी रुपये से अछूता नहीं—कहीं वह ज़कात बनकर इंसान को इंसान से जोड़ता है, तो कहीं वही रुपया धर्म का ठेकेदार बनकर इंसान को इंसान से तोड़ देता है।



अंततः निष्कर्ष यही है—

रुपया न पवित्र है, न अपवित्र;

वह एक अभिनेता है,

जो हमारे चरित्र की नक़ल करता है।

हम जैसे होते हैं

, रुपया वैसा ही दिखता है।

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राजकुमारी अमृत कौर :: एक जीवन-दृष्टि

 


राजकुमारी अमृत कौर :: एक जीवन-दृष्टि

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✍️ डॉ. गिरिजा कुमार वर्मा

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जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास रचा जा रहा था, तब एक सधी हुई अंग्रेज़ी बोलने वाली, ऑक्सफोर्ड-शिक्षित राजकुमारी गांधीजी के साथ असहयोग आंदोलन में जेल जाने को तैयार खड़ी थी। उनका नाम था राजकुमारी अमृत कौर आहलुवालिया — एक ऐसी विभूति जिनका जीवन सेवा, संघर्ष और संवेदनशील नेतृत्व का अप्रतिम उदाहरण बन गया।



🔶 जीवन परिचय


राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1887 को लखनऊ में हुआ। वे कपूरथला रियासत के शाही परिवार से थीं। उनके पिता राजा सर हरनाम सिंह एक सुसंस्कृत और धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने बच्चों को भारतीय परंपरा और यूरोपीय शिक्षा दोनों में दक्ष बनाया। अमृत कौर की प्रारंभिक शिक्षा शर्बोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स (Sherborne School for Girls) इंग्लैंड में हुई और उन्होंने आगे की पढ़ाई ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से की। धर्म से ईसाई, विचारों से मानवतावादी और कर्म से राष्ट्रभक्त — उन्होंने अपने जीवन का हर चरण भारत की सेवा को समर्पित कर दिया।



🔶 स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका


1919 में अमृत कौर की गांधीजी से भेंट हुई — यह जीवन की दिशा बदल देने वाला क्षण था। वे उनके विचारों से अत्यंत प्रभावित हुईं और भारत लौटकर सक्रिय राजनीति में कूद पड़ीं।

1930 में दांडी यात्रा में भाग लिया



'भारत छोड़ो आंदोलन' में भागीदारी



अनेक बार जेल यात्राएँ



सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रमुख महिला नेता



वह उन विरल महिलाओं में थीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों से सीधे टकराकर जेल में दिन बिताए और फिर संविधान सभा में भारत के अधिकारों की रक्षा की पैरवी भी की।



🔶 महत्त्वपूर्ण कार्य


🏥 1. स्वास्थ्य मंत्री के रूप में योगदान (1947–1957)

भारत के स्वतंत्र होने पर नेहरू सरकार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं और उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय सौंपा गया।

AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) की स्थापना की प्रमुख सूत्रधार।



BCG टीकाकरण, मलेरिया नियंत्रण, टीबी उन्मूलन और मातृ-शिशु स्वास्थ्य योजनाओं की शुरुआत।



नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (पटियाला) की स्थापना में योगदान।



“स्वस्थ राष्ट्र ही सशक्त राष्ट्र बन सकता है। स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं, आत्मा और समाज का भी होता है।”

 – राजकुमारी अमृत कौर


🧕 2. महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार

1927 में ऑल इंडिया वीमेन कॉन्फ्रेंस (AIWC) की स्थापना में अग्रणी भूमिका।



बाल विवाह, पर्दा प्रथा और देवदासी प्रथा के विरोध में अभियान चलाए।



महिला शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के लिए निरंतर संघर्ष किया।



📜 3. संविधान सभा में योगदान

वे संविधान सभा की सदस्य थीं और मौलिक अधिकार समिति एवं अल्पसंख्यक उपसमिति की सदस्य भी रहीं।



धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता जैसे विचारों का उन्होंने पुरजोर समर्थन किया।


🔶 प्रेरणादायक उद्धरण


“मैं एक ईसाई हूं, पर मेरा राष्ट्रधर्म मुझे बताता है कि हर पीड़ित की सेवा, हर रोगी का उपचार, और हर अशिक्षित को प्रकाश देना ही सच्चा धर्म है।”


“महिलाओं को मत मांगने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें अधिकार उठाकर लेने होंगे — शिक्षालय से लेकर संसद तक।”

“AIIMS केवल अस्पताल नहीं है, यह भारत की स्वास्थ्य-आशा का मंदिर है।”



🔶 लेखन एवं सार्वजनिक अभिव्यक्ति


राजकुमारी अमृत कौर ने अनेक लेख, पत्र और भाषण लिखे। उनके पत्र गांधीजी को, उनके नोट्स स्वास्थ्य नीतियों पर, और महिला आंदोलन के लिए उनके वक्तव्य आज भी शोध और प्रेरणा का स्रोत हैं।


“Notes on Indian Women and Education”



“Gandhi and the Women of India”



“A New Health Vision for a New India” (स्वास्थ्य नीति पर उनके भाषण का अंश)




🔶 निधन और विरासत


6 फरवरी 1964 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने कोई निजी संपत्ति नहीं छोड़ी, पर एक विशाल मानवीय और वैचारिक धरोहर छोड़ दी। आज भी AIIMS, नई दिल्ली के एक भवन का नाम “Amrit Kaur Wing” है। उनकी स्मृति नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम, नई दिल्ली में संजोई गई है।



उसका कहना था कि “अगर कोई मुझे याद करे, तो एक सेविका के रूप में — जिसने अपनी मातृभूमि के लिए यथाशक्ति श्रम किया।” राजकुमारी अमृत कौर केवल एक राजघराने की संतान नहीं थीं — वे जनतंत्र की जननी, स्वास्थ्य की प्रहरी, नारी सशक्तिकरण की संवाहक और मानवतावाद की मूर्ति थीं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्म, जाति और वर्ग

 की सीमाओं से ऊपर उठकर एक व्यक्ति कैसे राष्ट्र और मानवता की सेवा कर सकता है।

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शहीद जगदेव प्रसाद कुशवाहा

 शहीद जगदेव प्रसाद कुशवाहा 

सामाजिक न्याय के अमर योद्धा

(02 फरवरी, 1922–05 सितंबर 1974)

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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा 

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बिहार की धरती ने अनेक जननायकों को जन्म दिया है, जिन्होंने शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध संघर्ष को जीवन का लक्ष्य बनाया। इन्हीं में एक तेजस्वी, निर्भीक और क्रांतिकारी नाम है— शहीद जगदेव प्रसाद। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि सामाजिक न्याय की वैचारिकी को व्यवहार में उतारने वाले योद्धा थे। उनका जीवन उत्पीड़ित वर्गों के आत्मसम्मान, अधिकार और सत्ता में भागीदारी की अनथक लड़ाई का प्रतीक है।



जीवन परिचय


जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के भोजपुर ज़िले (तत्कालीन शाहाबाद) में हुआ। वे प्रारंभ से ही तेजस्वी बुद्धि, तार्किक सोच और अन्याय के प्रति असहिष्णु स्वभाव के थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने समाज की संरचनात्मक विषमताओं को गहराई से समझा और महसूस किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद सामाजिक स्वतंत्रता अब भी अधूरी है।



वे कुछ समय तक मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े, किंतु शीघ्र ही उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि सत्ता की पारंपरिक राजनीति बहुजन समाज के वास्तविक प्रश्नों को हाशिये पर रखती है। इसी वैचारिक असंतोष ने उन्हें शोषित समाज दल की स्थापना की ओर प्रेरित किया। यह दल केवल राजनीतिक मंच नहीं था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का वैचारिक आंदोलन था। 05 सितंबर 1974 को पटना में एक शांतिपूर्ण आंदोलन के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। इस प्रकार वे सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हो गए। उनकी शहादत ने उन्हें विचारों की दुनिया में अमर बना दिया।



जगदेव प्रसाद की वैचारिकी


जगदेव प्रसाद की वैचारिकी का केंद्रबिंदु था— बहुजन समाज की सत्ता में भागीदारी। उनका प्रसिद्ध नारा “सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है” भारतीय सामाजिक संरचना पर तीखा प्रहार करता है। यह नारा केवल संख्या का उद्घोष नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, अधिकार और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की माँग है।



1. सामाजिक न्याय की अवधारणा


जगदेव प्रसाद का मानना था कि जाति- आधारित शोषण भारत की सबसे बड़ी सच्चाई है। जब तक पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। वे सामाजिक न्याय को केवल आरक्षण तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि इसे सत्ता, संसाधन और सम्मान से जोड़कर देखते थे। उनकी दृष्टि में मनुवाद सांस्कृतिक और वैचारिक वर्चस्व का प्रतीक था। वे कहते थे कि वह व्यवस्था है जो श्रम करने वालों को हीन और शोषण करने वालों को श्रेष्ठ ठहराती है, उसके विरुद्ध संघर्ष को वे सामाजिक क्रांति की अनिवार्य शर्त मानते थे।



3. लोकतंत्र की पुनर्परिभाषा


जगदेव प्रसाद के अनुसार, लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है। जब तक बहुसंख्यक समाज सत्ता से बाहर है, तब तक लोकतंत्र एक छलावा है। वे “संख्यात्मक लोकतंत्र” के साथ-साथ “सामाजिक लोकतंत्र” की स्थापना के पक्षधर थे।



4. वैचारिक निर्भीकता


उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी— निर्भीकता। वे किसी भी कीमत पर अपने विचारों से समझौता नहीं करते थे। सत्ता, लोकप्रियता या समझौतावादी राजनीति उन्हें स्वीकार नहीं थी। यही कारण है कि वे अल्प समय में ही सत्ता प्रतिष्ठान के लिए असुविधाजनक बन गए। शहीद जगदेव प्रसाद को अक्सर “पिछड़ों का लेनिन” कहा जाता है। उनकी वैचारिकी ने बाद के वर्षों में बिहार ही नहीं, पूरे उत्तर भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। मंडल आंदोलन, सामाजिक न्याय की राजनीति और बहुजन चेतना के विकास में उनके विचारों की स्पष्ट छाया देखी जा सकती है।



आज जब सामाजिक असमानता, प्रतिनिधित्व का संकट और वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तब जगदेव प्रसाद के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष से आता है।



शहीद जगदेव प्रसाद का जीवन एक विचारशील बलिदान था। उन्होंने दिखाया कि राजनीति सत्ता पाने का नहीं, समाज बदलने का माध्यम हो सकती है। उनकी शहादत हमें यह स्मरण कराती है कि सामाजिक न्याय कोई दया नहीं, बल्कि अधिकार है—और उसके लिए संघर्ष अपरिहार्य है। जगदेव प्रसाद भले ही देह रूप में हमारे बीच न हों, किंतु उनकी वैचारिकी आज भी हर उस आवाज़ में जीवित है जो बराबरी, सम्मा

न और न्याय की बात करती है।

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