20 अप्रैल 2011

*****ईमानदारी की सेल

                        -डॉ० डंडा लखनवी


चित्र : गूगल से साभार
आज हर तरफ अन्ना-अन्ना हो रहा है। मेरा इस शब्द से बड़ा लगाव रहा है। बचपन में अधन्ना से परिचय हुआ। पॉकेटमनी के रूप में पिता जी दिया करते थे। तबके बालक अधन्ना पा कर प्रसन्ना-प्रसन्ना रहते थे।

आगे चल कर प्रसन्ना नाम कानों में गूँजने लगा। इसमें भी अन्ना की अनुगूँज है। क्रिकेट मैच आज की तरह पहले भी होते थे किन्तु तब मैच  कानों से देखे जाते थे। जैसे ही कोई विकेट चटकता लोग ताली बजा कर झूमने लगते। उनके मुख से बरबस निकल पड़ता था- वाह प्रसन्ना! वाह प्रसन्ना! । प्रसन्ना और अन्ना में विचित्र समानता है। वे क्रिकेट के विकेट चिटकाते थे और ये भष्टाचारियों  के विकेट। 


जंतर-मंतर को कोप-स्थल बनाने वाले अन्ना पर आजकल मीडिया का बड़ा फोकश है। वे हजार अन्ना में एक हैं। उनका अन्ना हजारे नाम वैसे ही नहीं पड़ा है। धवलता मात्र इनके वस्त्रों में नहीं, चरित्र में झलकती है। इनके पास उपवास नामक शक्तिशाली हथियार है। इसके प्रयोग करते ही प्रशासनिक हलके में सुनामी आ जाती है। अपने हथियार का परिक्षण ये प्राय: करते रहते हैं। भ्रष्ट-कुर्सी हिलाना इनका पसंदीदा शौक़ है। हमारे यहाँ राज्यपाल, सींचपाल, लेखपाल पहले से हैं। सब के सब अपने-अपने तरह से भ्रष्टाचार को उखाड़ते हैं। अब लोकपाल बिल बनने जा रहा है। कुछ लोग इस बात से खुश हैं कि बिल बनवाने का ठेका अन्ना के पास है। माना लोकपाल बिल बन गया। चरित्र के बिना फिर समस्या आएगी। दूध का धुला लोकपाल कहाँ से लाओगे और उसे बहती गंगा में हाथ धोने से कौन रोकेगा?

मनुष्य नामक जीव की पशुता दूर करने
के लिए पाठशालाएं, कोतवाली, अदालतें तथा जेल हैं। पूजाघरों की देश भर में कमी नहीं है। टी०वी० चैनलों पर उपदेशकों की भरमार है। सभी बेचैन हैं आदमी को चरित्रवान बनाने में। फिर भी ढ़ाक के तीन पात। हर तरफ कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। भ्रष्टाचार का ग्राफ आसमान चढ़ा जा रहा है। पता लगाइए! कहीं जिन एजेंसियों के कंधों पर मानवीय चरित्र को सवाँरने  का दायित्व है वे  "ईमानदारी"  की सेल कम होने कारण  अपना धंधा तो नहीं बदल चुकीं हैं



17 अप्रैल 2011

भारतीय संस्कृति का अनूठा उत्पाद : कास्टोमीटर

   
                     -डॉ० डंडा लखनवी

जिस तरह से वाहनों गति नापने के लिए स्पीडोमीटर, शरीर का ताप नापने के लिए थर्मामीटर, दूध की शुद्धता नापने के लिए लैक्टोमीटर का प्रयोग होता है ठीक उसी तरह व्यक्ति की योग्यता नापने के लिए भारत में "कास्टोमीटर" प्रयोग में लाया जाता है। यह भारतीय संस्कृति का अनूठा उत्पाद है। इस यंत्र के पैरामीटर का सारा प्रोग्राम कुलीनता के सिद्धान्त पर कार्य करता है। व्यक्ति योग्य है अथवा अयोग्य, विद्वान है अथवा मूर्ख, मेहनती है अथवा आलसी, बहादुर है अथवा कायर इत्यादि  की  जानकारी हासिल करने करने के लिए यह यंत्र बड़ा कारगर है। इसमें व्यक्ति की शैक्षिक योग्यताओं का डाटा डालने वाला बटन नहीं होता है। इस  यंत्र  को  व्यक्ति के तत्कालीन पद एवं प्रतिष्ठा में रूचि नहीं होती है अपितु उसके पुरखों के धंधों को सूंघने में बड़ी रुचि होती है। प्रतिभा के मूल्यांकन में इसे चरित्र प्रमाण-पत्र की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। आदमी ईमानदार है अथवा बेईमान इसका इस यंत्र से कोई मतलब नहीं। यह यंत्र व्यकित की कास्ट देखता है और कुछ  नहीं। इसलिए इस यंत्र का नाम कास्टोमीटर पड़ा है   
 
कास्टोमीटर नामक यंत्र का प्रयोग बड़ा आसान है। बस! व्यक्ति की जाति पूछिए और कास्टोमीटर में फीड कर दीजिए। अब आपका काम ख़त्म हो गया।  यंत्र काम करना शुरू करेगा। इसकी सुई नीच अथवा ऊँच की डिग्री के अनुसार ऊपर-नीचे सरकने लगती है। यदि यंत्र की सुई ऊपर की ओर खिसके तो समझ जाइए व्यक्ति  के पुरखों के पास कुलीनता का ठेका था और वह योग्य एवं  ईमानदार है। यदि यंत्र की सुई नीचे की ओर खिसके तो समझिए कि व्यक्ति के पुरखे कुलीनता की धंधेंबाजी में नहीं फंसे थे इसलिए वह नीच, अयोग्य तथा बेईमान है। यदि यंत्र की सुई मीटर के मध्य में अथवा उसके आसपास ठहरे तो समझिए कि प्रतिभा में नीच और ऊँच दोनों का मेल  है।

कास्टोमीटर यह भी तय कर देता है कि अमुख व्यक्ति को कितना सम्मान देना है अथवा उसका कितना अपमान करना है। कास्टोमीटर बताता है कि व्यक्ति को बैठने के लिए कैसा आसन देना है-शोफा, कुर्सी, मोढ़ा, चटाई, फर्श इत्यादि इत्यादि। यंत्र यह भी बताता है कि किसी व्यक्ति के उपयोग के बाद आसन को धोना है अथवा उसे नहीं धोना है। 


उच्चकोटि के कास्टोमीटर में कई खूबियाँ होती हैं। वे व्यक्ति के बदन में बसी सुगंध अथवा दुर्गंध को भी ताड़ लेते हैं। कुलीनता की महक से प्रयोग-कर्ता  की बत्तीसी खिल सकती है। वहीं अकुलीनता की बदबू से उनके नाक-भौं सिकुड़ सकते हैं, वी.पी. हाई हो सकता है। यदि आप विदेश जा रहे हों और आपके पास अपना कास्टोमीटर हो तो उसे घर पर ही छोड़ जाइए।  भारत के अलावा यह यंत्र संसार भर में कहीं उपयोगी नहीं है। हाँ! आप भारत में हों और कोई आपका नाम पूछे तो उसे अपना नाम बता दें। आपके उत्तर से  संतुष्ट न  हो और पूछे कि आप नाम के आगे या पीछे क्या लगाते हैं? तब आप तुरंत समझ जाइए कि उसके पास ख़ुफ़िया कास्टोमीटर है वह उसका  जल्द से जल्द उपयोग करना चाहता है। जब तक आपका सरनेम उसे पता नहीं लग जाएगा उसका कास्टोमीटर उसे चैन से बैठने नहीं देगा



10 अप्रैल 2011

******भ्रष्टाचार : तेरे रूप बेशुमार

                                           -डॉ० डंडा लखनवी

भ्रष्टाचार की जड़ें सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त हैं। इस रोग से सारा देश पीड़ित है। श्री अन्ना हजारे ने उसके उपाचार का बीड़ा उठाकर सोए हुए भारतीय समाज में हलचल पैदा कर दी है। सदियों से व्यंग्यकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमत बनाते रहे हैं। व्यंग्य का कार्य ही है समाज में पर्दे के पीछे हो रहे लोक विरोधी कार्यों को सामने लाना है। इससे समाज में जागरूकता उत्पन्न होती है। असमाजिक तत्वों का हौसला पस्त होता है। समाज में मानवीय मूल्य स्थापित होते हैं और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होता है। व्यंग्यकार इस काम को स्वत:स्फूर्त होकर करता है। व्यंग्यकार का काम जोखिम भरा है। साहित्य की अन्य विधाओं में इतना जोखिम नहीं है। कबीर ने उस जोखिम को उठाया था। कबीर का नाम हिंदी साहित्य में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। व्यंग्य की तेज छूरी से उन्होंने ने सामाजिक शल्य-चिकित्सा बड़े कौशल से की थी। आज व्यंग्य का फलक और उसका स्वरूप बहुत विस्तृत हो चुका है।

आधुनिक काल में व्यंग्य की एक स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान बन चुकी है। व्यंग्य भ्रष्टाचार से लड़ने का कारगर हथियार है। यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के लिए जमीन तैयार करता है। जिस तरह से खद्दर के वस्त्र पहन भर लेने से कोई व्यक्ति सच्चा-जनसेवी नहीं बन जाता है उसी तरह से साधुओं जैसा मेकअप कर लेने से व्यक्ति चरित्रवान नहीं बन जाता है। धर्म और राजनीति का रिस्ता चोली और दामन जैसा रहा है। धर्म और चरित्र दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। यदि ध्रर्म व्यक्ति को चरित्रवान बनाता तो विभिन्न धर्मों में परस्पर संघर्ष न होते और न सांप्रदायिक इकाईयों के अलग-अलग धड़ों में परस्पर टकराव होते। धर्मभीरुता चरित्रवान होने की गारंटी नहीं है। कोई भी धर्म न ही अपने समस्त अनुयायियों के चारित्रिक शुद्धता का दावा कर सकता है।

चरित्र मानवीय-मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से सवंरता है। चरित्रवान के लिए आत्म-निरीक्षण और अवगुणों से छुटकारा पहली शर्त है। संयम और त्याग की आँच पर ख़ुद को तपाना पड़ता है। हरामख़ोरी से बचना होता है। दूसरों के साथ वही व्यवहार करना पड़ता है जैसा हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं। चरित्र बाहरी दिखावा नहीं अभ्यांतरिक शुद्धता है। चरित्र व्यक्ति के आचरण और व्यवहार से झलकता है।

@ चरित्र-प्रमाण पत्र की सभी को आवश्यकता पड़ती है। आपको भी पड़ी होगी। क्या कभी आपने सोचा है कि जो व्यक्ति आपको चरित्र प्रमाण-पत्र जारी कर रहा है वह चरित्र के मामले में पूर्ण रूपेण खरा है? वह कदाचारी भी हो सकता है। कई बार आप उसके चरित्र के विषय में जानते भी होंगे। कदाचारी व्यक्ति सदाचार का प्रमाण-पत्र का प्रमाण-पत्र जारी करता है? यह कैसी विडंबना है?

@ रिश्वतख़ोर व्यक्ति को जब खरी-खोटी सुनाई जाती है तो वह कहता है-"आपको मौका नहीं मिला है इसलिए ऐसी बातें करते हो।" यह कह कर वह कहना चाहता है -"उसे मौका मिला है। वह अपनी मर्जी का मालिक है। वह जो चाहे सो करे उस पर कोई उंगली न उठाए।"

@ सभी लोग जानते हैं कि दहेज एक सामाजिक अभिशाप है। इसे रोकने के लिए कानून भी बना है। कानून किनारे धरा है। महंगी शादियों का मीडिया द्वारा भोड़ा प्रदर्शन खूब किया जाता है। सबको दिखाकर दहेज लेना और देना बदस्तूर जारी है। यह कैसी ईमानदारी है?

@ एक व्यंग्यकार से प्रश्न किया गया कि आजकल भ्रष्टाचार का ग्राफ ऊँचा क्यों है? उसका उत्तर था कि अधिकांश लोग चाह्ते हैं कि सरदार भगतसिंह यदि पुर्न जन्म लें तो पड़ोसी के घर में लें और माइकेल जैक्शन अथवा नटवर लाल उनके घर में। अत: अगर कोई आफ़त आवे तो पड़ोसी के घर में आवे और उसका घर सुरक्षित रहे।
                                                        अन्ना हजारे.....जिन्दाबाद!

08 अप्रैल 2011

***** अन्ना की आवाज : आम जनता की आवाज

                                         -डॉ० डंडा लखनवी



भ्रष्टाचार की जड़ें सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त हैं। इस रोग से सारा देश पीड़ित है। श्री अन्ना हजारे ने उपाचार का बीड़ा राजनैतिक क्षेत्र से उठा कर सोए हुए भारतीय समाज में हलचल पैदा कर दी है। उनकी चिंता जायज है। कुछ लोग जनसेवा को व्यवसाय समझने लगे हैं। आम जनता की आवाज को अनसुना करने की प्रवृत्ति राजनीति एवं नौकरशाही में घर कर गई है। अपनी उपेक्षा से भारत का आम नागरिक स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करता है। उन्होंने ने आम आदमी के मनोभावों को स्वर दिया है। उनकी इस मुहिम में आज सारा देश उनके साथ है। उनकी आवाज भारत के आम-जन की आवाज है। बौद्ध-काल में प्रत्येक नागरिक को जीवन-मूल्य "पंचशील" को आत्मसात करने का संकल्प लेना रोज की दिनचर्या में सामिल था। जिसके प्रभाव से अधिकांश नागरिक शीलवान हुआ करते थे और वह युग भारतीय इतिहास में स्वर्ण-युग कहलाया। वह व्यवस्था कालान्तर में स्वार्थपरक कारणों से छिन्न-भिन्न हो गई। आज कदाचार को जीवन में उतारने की होड़ -सी लग गई है। सदाचारी एवं परोपकारी व्यक्ति को बुद्धिहीन समझा जाने लगा है।

सत्तासन हो अथवा धर्मासन दोनों में व्याप्त कदाचरण की खबरें अखबारों की सुर्खियाँ बनती रही है। कुट्टू के आटे में मिलावट से देश भर में हजारों लोगों का जीवन संकट में पड़ गया। यह व्यावसायिक भ्रष्टाचार का जिंदा उदाहरण है। कदाचार के सहारे कोई देश अधिक दिनों तक स्वतंत्र नहीं रह सकता है। व्यक्ति अथवा समाज का विकास सदाचार की ठोस भूमि पर होता है। सदाचार को जीवन में उतारने की परम आवश्यकता है। भ्रष्टाचार की नदी ऊपर से नीचे की ओर बहती है। यदि उद्गम स्थल पर भ्रष्टाचार का प्रवाह रोक दिया जाय तो वह निचले स्तर पर फैलने नहीं पाता। हमें राजनैतिक क्षेत्र के साथ धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक क्षेत्र को भी भ्रष्टाचार से मुक्त करना होगा। प्रबल इच्छा-शक्ति के बल पर "लोकपाल-विधेयक" समाज को स्वच्छ बनाने में कारगर सिद्ध होगा।


25 मार्च 2011

********बीड़ा और बीड़ी

                                     -डॉ० डंडा लखनवी

पान लगाने की कला और उसे पेश करने के फ़न में ’बनारस’ अव्वल है। इसकी उत्तम प्रजाति उपजाने में ’महोबा’ का नाम है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा में पान की प्रतिष्ठा सदियों पुरानी है। पूजन सामग्री में पान का विशेष महत्व है। प्राचीन काल के चिकित्सक अपनी कड़वी और बेस्वाद दवाओं को पान के बीच रखकर खाने की सलाह दिया करते थे। अतः कहा जा सकता है कि आधुनिक युग के कैपसूलों का उस युग में  पान विकल्प था। इसे लगाना अपने आप में एक विशिष्ट कला है। अनेक प्रकार के सुगंधित, स्वादिष्ट, स्फूर्तिदायक मसालों में यह लपेटा जाता था। इसके ऊपर विशेष कौशल से चाँदी-सोने का वर्क लगाया जाता था। उसे 'बीड़ा ' कहा जाता था। 


भारतीय समाज में बीड़ा उठाने की प्रथा सदियों पुरानी है। राज्य के चुनौती पूर्ण अभियानों को संपन्न करने के लिए जब कभी साहसी एवं पराक्रमी नायक की आवश्यकता पड़ती थी। तब उसकी सूचना व्यापक रूप से राज्य भर में प्रचारित कर दी जाती थी और पान का बीड़ा दरबार में निर्धारित स्थान पर रख दिया जाता था। चुनौतीपूर्ण अभियान को पूर्ण करने का संकल्प लेकर जो नागरिक आगे आता था वह दरबारियों के सम्मुख ’बीड़े’ को उठा कर खाता था। तत्पश्चात अभियान पूर्ण करने के लिए प्रयाण कर जाता था। अभियान को सफल करके लौटने पर उस व्यक्ति का राजकीय सम्मान किया जाता था। यह राज्य और व्यक्ति दोनों के लिए गौरव की बात होती थी। इस तरह बीड़ापायी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा में काफ़ी इजाफ़ा हो जाता था। भारत के ऐतिहासिक आख्यानों में बीड़ा उठाने का अनेक स्थलों पर उल्लेख मिलता है। कालांतर में ’बीड़ा उठाना’ मुहावरे के रूप में प्रयुक्त होने लगा। इसका अर्थ है-’स्वेच्छा से किसी चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरा करने की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति।’
    


प्रायः देखा गया है कि जिस उद्देश्यों को आधार मानकर कोई परंपरा जन्म लेती है धीरे-धीरे उसके उद्देश्यों में विचलन आ जाता है। समाज परंपरा के मूल उद्देश्यों से भटक जाता है। ऐसा इस प्रथा के साथ भी हुआ। लोग ’बीड़ा-उठाना’ भूल गए। बीड़ापायी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को देखकर नकली बीड़ा-चबाने वालों की बाढ़ आ गई। क्योंकि नकली बीड़ापायी ओछेपन का दामन पकड़े थे। अत: वे अपनी फूहड़ता से सार्वजनिक स्थानों को गंदा करने लगे। बात बीड़ा चबाने तक सीमित रहती तो भी गनीमत थी। लकीर के फकीरों ने पान के पत्ते का विकल्प तेंदू का पत्ता खोज लिया। फिर तेंदू के पत्ते में तंबाकू को लपेट कर बीड़ा के साथ बीड़ी को भी मैदान में उतार दिया गया। अब बीड़ा, बीड़ी दोनों  हैं परन्तु हर क्षेत्र में व्याप्त चुनौतियों से लोहा लेने वाले नदारद हैं।

18 मार्च 2011

क्या फागुन की फगुनाई है


               -डॉ० डंडा लखनवी

क्या     फागुन    की     फगुनाई  है।
डाली    -   डाली         बौराई       है॥
हर   ओर    सृष्टि    मादकता     की-
कर   रही     मुफ़्त        सप्लाई  है॥

धरती      पर      नूतन    वर्दी     है।
खामोश      हो    गई      सर्दी     है॥
कर    दिया   समर्पण   भौरों       ने-
कलियों         में       गुंडागर्दी     है॥


मनहूसी         मटियामेट       लगे।
खच्चर    भी     अपटूडेट       लगे॥
फागुन     में   काला     कौआ    भी-
सीनियर        एडवोकेट         लगे॥


मत     इसे   आप    समझें मजाक़।
मुर्गा  -   मुर्गी   हो    या     पिकाक॥
बालीवुड      के       माडल       जैसे-
करते  वन   -  वन    में   कैटवाक॥


अब   इस   सज्जन  से आप मिलो।
फिश   पर  जो   फिदा    हमेशा हो॥
अप्रेन     पहने       रहता      सफेद-
है   बगुला,  लगता  सी०एम०ओ०॥


बागों      में      करते       दौरे      हैं।
गालों     में     भरे        गिलौरे    है॥
देखो    तों    इनका      रसिक   रूप-
शृंगारिक    कवि    सम    भौरे    हैं॥


जय      हो    कविता   कालिंदी  की।
जय     रंग     रंगीली     बिंदी   की॥
मेकप     में   वाह    तितलियाँ   भी-
लगती     कवयित्री     हिंदी      की॥


वह    साड़ी        में   थी   हरी - हरी।
रसभरी   रसों      से    भरी -  भरी॥
नैनों     से       डाका    डाल       गई-
बंदूक      दग     गई      धरी - ध्ररी॥

यह       फागुन    की   अंगड़ाई    है।
गुम       हो    जाती   तनहाई      है॥
स्वीकारो      हँसी   -   ठिठोली    के-
मौसम    की     यही     बधाई      है॥


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22 जनवरी 2011

क्या आपको ब्लाग-फालोवरों की तलाश है?

                          -डॉ० डंडा लखनवी

साहित्य के क्षेत्र में कदम रखते ही कुछ उत्साही कलमकार तत्काल धन और यश की कामना करने लगते हैं। जब मनोकामना की पूर्ती नहीं होती है तो उनमें निराशा घर कर जाती है। इस संबंध मेरा मानना है कि साहित्य-लेखन एक साधना है। इसमें सिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रतिभा के साथ लगन और धैर्य की आवश्यकता होती है। किसी को रचना लिखने के पूर्व लेखक को सोचना चाहिए कि क्या लिखना है और क्यों लिखना है। प्रयोजन स्पष्ट होगा तो लक्ष्य तक पहुँचना आसान होता है। लेखक को लेखन परंपरा का ज्ञान होना आवश्यक है। इसके लिए उसे खूब अध्ययन करना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों की संगति से भी कुछ लाभ मिल सकता है। 
प्रसिद्ध उपन्यासकार स्वर्गीय अमृतलाल नागर ने मुझे सुझाव दिया था- "किसी रचना के लिखने के बाद उसे तत्काल प्रकाशित मत कराओ। कुछ दिनों के लिए उसे फाइल में दबा कर रख दो।" मैंने  उनसे पूछा- "इस सुझाव के पीछे आपका क्या मंतव्य है।" उन्होंने कहा- "जल्दबाजी में रचना में अनेक ऐसे अनेक तथ्य छूट जाते हैं जिनके समावेश से रचना में चार-चाँद लग सकना संभव होता है। यदि आप आज लिखी रचना को कुछ माह बाद पढ़ोगे तो अनेक खामियाँ अपने आप पकड़ में आ जाएंगी। परिमार्जन लेखन प्रक्रिया का अंग है। बड़े से बड़े साहित्यकार को अपनी रचनाओं में परिमार्जन करना पड़ना है।"

मनुष्य प्रशंसाप्रिय प्राणी है। प्रशंसा उसे उत्साहित करती है। वहीं थोथी प्रशंसा उसे गुमराह भी कर सकती है। ब्लागों की भीड़ में फालोवर जुटाने से कलमकार को बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। भीड़ प्रोत्साहित करती है, मार्गदर्शन नहीं। अत: भीड़ से प्रशंसा हासिल करना आत्म-सम्मोहित होना है। इस क्षेत्र के नवागंतुकों को विषय-मर्मज्ञ के द्वारा उनकी कला के गुण-दोषों को उजागर करने वाली टिप्पणी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। इस तथ्य की पुष्टि में महाकवि वृंद के एक दोहे का उल्लेख करना यहाँ पर्याप्त होगा-

"सरस कविन के चित्त को, वेधत हैं द्वै कौन।
असमझदार   सराहिबो,   समझदार को मौन॥"

साथियो! आपका पुरषार्थ व्यर्थ नहीं जाएगा। अतएव आप अपनी प्रतिभा  और लेखन-क्षमता को पहचानिए। धैर्य पूर्वक आप अपना काम निरंतर करते रहिए। कुछ ही वर्षों में यश और सम्मान आपका स्वमेव अनुगमन करेगा। अंत में अपनी गज़ल के एक शेर से इस आलेख को विराम देता हूँ- 
                 
             "अगर के बाटोगे आप खुशबू तो हाथ महकेंगे आपके भी।"



17 जनवरी 2011

          









        

     कुर्सी तेरे चट्टे - बट्टे
          
                                           -डॉ० डंडा लखनवी

कुर्सी       तेरे       चट्टे - बट्टे।
कैसे       इतने      हट्टे - कट्टे?

जिनके    हाथों  श्रम   के ढ़ट्ठे-
वो  क्यों   निर्बल  और सुखट्टे॥

जो   खाते  सब   माल-मसाला-
वही    दिखाते  हमे   ठिंगट्टे॥

सुबह - सुबह  अख़बार  बताते-
नक़ब - रहज़नी, छीन - झपट्टे॥

ये    कैसी     आजादी   बापू-
दाँत  हुए     जनता    के खट्टे॥

अब  लंगोट   की   कद्र कहाँ है-
मूल्यहीन    हो   गए   दुपट्टे॥

शोषक   हित  में कहीं न बाधा-
जनहित   में    लाखों अरझट्टे॥

22 दिसंबर 2010


   प्रेम   जहाँ   अंधा  है
चित्र गुगल से साभार
 

प्रेम   एक     गेम   है।
जिसका  शुभ  ऐम है॥

सपनों   से  सजा-धजा-
सुख-दुख  का  फ्रेम है।

हार - जीत   पर इसमें
होता  नो    क्लेम  है॥

परवानों  के   ख़ातिर-
ज्वाला है,   फ्लेम  है॥

प्रेम के बिना फिर भी-
कहाँ   कुशल-क्षेम है॥

पहले   लुटता  मूरख-
करता फिर  ब्लेम है॥

प्रेम     बेवफाई    को-
करता    कनडेम   है॥

प्रेम   जहाँ   अंधा  है-
वहीं  शेम  -  शेम है॥

सबके दिल   में "डंडा"
इसका    गुडनेम  है॥


17 दिसंबर 2010






जब उनकी डिग्री देखी





पक्के       वो        मनमानी   में।
डिप्लोमा            शैतानी      में॥


कभी  -  कभी     वो    जेल  चले-
जाते      हैं        मेहमानी    में॥


कई      बार    
हैं     लड़े    मगर-
हार     गए       परधानी      में॥


चमक      रहे       काले     धंधे-
चमचों     की    निगरानी    में॥


चोर,   उचक्के,   रहजन       हैं-
खुश      उनकी   कप्तानी   में॥


मीलों    भूमि    दबाए  फिर भी-
 
चर्चित      हैं      भूदानी     में॥


चाह   रहे    हैं   नाम    जोड़ाना-
स्वतंत्रता         सैनानी       में॥
 

जब    उनकी      डिग्री    देखी-
एम०ए०      जहरखु़रानी     में॥



12 दिसंबर 2010

चित्र cartoonindore.blogspot.com से साभार



















तीन मुक्तक




(1) मंहगाई


मंहगाई    हरजाई    है
करती जेब - सफाई है॥
कोई   नेता   क्यों   बोले-
उनके   लिए   मलाई है॥


(2) लोकतंत्र


तुमने जिसको वोट दिया।
उसने कर विस्फोट दिया॥
मौका   पाया  लोकतंत्र का-
गला   जोर  से घोट दिया॥


(3) डेंगू


वे   वतन  को  चर रहे  हैं।
पेट अपना   भर   रहे   हैं॥
खैर   मांगे    उनसे    डेंगू -
मरने   वाले   मर   रहे हैं॥

29 नवंबर 2010

 प्रसिद्ध साहित्यकार  सत्यकाम "शिरीष"










सत्यकाम "शिरीष" का चर्चित गीत "नहीं सच हो सका सपना" उन्हीं के स्वर में सुनिए।

21 नवंबर 2010

 भूर्ण-हत्या पर कवि रामबहादुर ’पिंडवी’ का लोकगीत

   
कवि रामबहादुर ’पिंडवी’ 
से भोजपुरी  में उनका मार्मिक लोकगीत सुनिए

14 नवंबर 2010

चर्चित गीतकार श्री शिवभजन "कमलेश"
का काव्य-पाठ




नई और पुरानी पीढ़ी के बीच होने वाले वैचारिक मतभेदों पर आधारित विचारपरक गीत "कोई अर्थ नहीं निकलेगा" को चर्चित गीतकार श्री शिवभजन "कमलेश" से उनके स्वर में आस्वादन कीजिए।


11 नवंबर 2010

लेखक,  संपादक,  समीक्षक, भाषाविद, प्राध्यापक  साहित्यभूषण    डॉ० रामाश्रय सविता से उनका बहुचर्चित गीत "आँसुओं है मना" सुनिए।




        
                           डॉ० रामाश्रय सविता के स्वर में उनका काव्य-पाठ

08 नवंबर 2010


 
        

दिवाली  मुबारक
             

                   -डॉ० डंडा लखनवी

नई   रोशनी   नव,  प्रणाली    मुबारक।
दिवाली   मुबारक,   दिवाली   मुबारक॥

हुए  खेल   ही   खेल   में  खेल  कितने-
"फ्री - इंडिया"   में    दलाली  मुबारक॥


प्रधानी   मिली  चन्द  कट्टों  के बल  पे-
दिवाली  में   आई    दुनाली  मुबारक॥



सभी   काम  उनके  हैं   होते  फटाफट-
तुम्हारे   में      हीलाहवाली   मुबारक॥



ओबामा जी  लाए  दिवाली  का तोहफ़ा-
मिले जो  भी  डाली  वो डाली मुबारक॥

गबन  में  हुए  थे जो  परसों  मुअत्तल-
हुई   आज   उनकी   बहाली  मुबारक॥

घर  आई  हुई  "लक्ष्मी" का है स्वागत-
अगर वो है "काली" तो काली मुबारक॥

असरदार गण के  हैं सरदार "गणपति"-
सभी  छवियाँ उनकी निराली मुबारक॥

25 अक्टूबर 2010



ग़ज़लकार कुवंर  कुसुमेश के स्वर में 

उनकी ग़ज़ल : हर शाम छलकते हैं पियाले कहीं-कहीं



                                 ग़ज़लकार कुवंर कुसुमेश अपने अध्ययन-कक्ष में



 

                                  ग़ज़लकार कुवंर कुसुमेश रचना-पाठ करते हुए



03 अक्टूबर 2010

गजल : आ सको आना भला ये भी बुलाना ........



प्रसिद्द साहित्यकार -रवीन्द्र कुमार ’राजेश’
के स्वर में उनकी गजल का आस्वादन
कीजिए।

प्रस्तोता -डॉ० डंडा लखनवी