✍🏻 डॉ. डंडा लखनवी
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कभी चाय बहुत शरीफ़ हुआ करती थी। वह हर समय उपलब्ध नहीं रहती थी, न ही हर घर की सदस्य थी। बचपन में चाय मौसम देखकर आती थी—वह भी केवल जाड़ों में। गर्मियों में चाय का नाम लेना बदतमीज़ी माना जाता था। तब चाय न सर्वकालिक थी, न सर्वव्यापी और न ही सर्वशक्तिमान। आज चाय हर जगह है—बस भगवान के मंदिर में ही शेष है, वहाँ भी प्रसाद के रूप में पहुँचने की कोशिश में है।
उन दिनों एक कप चाय दस पैसे में मिल जाती थी—पूरे दस पैसे में। आज इतने में चायवाला कप भी न दिखाए। तब एक कप चाय में स्वाद भी होता था और मात्रा भी। आज उसी मात्रा से चार कप बन जाते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले चाय होती थी, अब उसका ट्रेलर चलता है। महँगाई अब चाय से नहीं, चाय पीने वालों की सहनशक्ति से मापी जाती है।
मेरी नानी बताया करती थीं कि अंग्रेज़ों के ज़माने में ‘लिपटन-टी’ वाले चौराहों पर बड़े कंटेनरों में मुफ्त चाय बाँटते थे। अंग्रेज चालाक थे—वे जानते थे कि एक बार भारतीयों को चाय की आदत लग गई, तो राज भले चला जाए, चाय का साम्राज्य नहीं जाएगा। यह इतिहास भले किताबों में न हो, पर हर कप में दर्ज है।
आज चाय पीने वाला साधारण नागरिक नहीं रहा, वह ‘टी-लवर’ हो गया है। जैसे शराब पीने वाला शराबी कहलाता है, वैसे ही दिन में पाँच बार चाय पीने वाला गर्व से खुद को टी-लवर कहता है। ‘चायाबी’ शब्द हमें देसी लगता है, इसलिए हमने अपनी लत को अंग्रेज़ी पहनाकर सामाजिक मान्यता दे दी है। आदत अब शौक नहीं, स्टेटस बन चुकी है।
पहले अतिथि के सामने पान रखा जाता था। पान न मिले तो भी संबंध चलते रहते थे। आज चाय न मिले तो संबंधों में खटास आ जाती है। पान छोड़ दिया गया, पर चाय अनिवार्य कर दी गई। कई रिश्ते तो अब केवल “चाय पर आइए” के भरोसे चल रहे हैं।
आज चाय की कीमत चाय से ज़्यादा उसके पात्र पर निर्भर करती है। चाय वही रहती है—बस कप बदलते ही रेट बदल जाते हैं।
डिस्पोज़ल कप में सस्ती,
मिट्टी के कुज्जे में महँगी,
काँच में इज़्ज़तदार और
स्टील में पूरी तरह सरकारी।
थैली में बंद चाय पीकर आदमी तय नहीं कर पाता कि उसने चाय पी है या कोई पैथोलॉजी रिपोर्ट।
डॉक्टर कहते हैं—“चाय कम पीजिए, यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” टी-लवर मुस्कराकर जवाब देता है—“डॉक्टर साहब, ज़हर नहीं है…ज़िंदगी है। बस दो घूँट और।”
सत्तर के दशक की दस पैसे वाली चाय आज तीस रुपये की हो चुकी है। चाय महँगी नहीं हुई—हम सस्ते हो गए हैं। स्वाद गया, मात्रा गई, स्वास्थ्य गया—बस आदत बची है। घर हो या दफ़्तर, बस अड्डा हो या रेलगाड़ी—“चाय गरम है!” की आवाज़ सुनते ही नींद टूट जाती है और तलब जाग उठती है।
अब चाय केवल पेय नहीं रही, वह सामाजिक मजबूरी बन चुकी है। और हम सब, जाने-अनजाने, गर्व से चायाबी बने बैठे हैं—हाथ में कप, होंठों पर मुस्कान और मन में अगली चाय की प्रतीक्षा। सच यही है कि चाय ने हमें नहीं अपनाया— हमने ही अपने विवेक का आत्मसमर्पण उसके हाथों में कर
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