06 दिसंबर 2012

जब-जब झाडू...


पैरोकार ....


रोता बच्चा हंस ...



बच्चों की मुसकान में ...



पाखंडों से दोस्ती ...



बाजारवाद और हम



07 मार्च 2012

डॉ० राम निवास ‘मानव’ की क्षणिकाएं


(1)
सीमा पार से निरंतर
घुसपैठ जारी है|
‘वसुधैव कुटुम्बकम’
नीति यही तो हमारी है|
(2)
दलदल में धंसा है|
आरक्षण और तुष्टीकरण के,
दो पाटों के बीच में
भारत फंसा है|
(3)
लूट-खसोट प्रतियोगिता
कबसे यहाँ जारी है |
कल तक उन्होंने लूटा था,
अब इनकी बारी है|
(4)
देश के संसाधनों को
राजनीति के सांड चर रहे हैं|
और उनका खामियाजा
आमजन भर रहे हैं|
(5)
मेरा भारत देश
सचमुच महान है|
यहाँ भ्रष्टाचारियों के हाथ में
सत्ता की कमान है|
(6)
जो नेता बाहर से
लगते अनाड़ी हैं|
लूट-खसोट के वे
माहिर खिलाडी हैं|
(7)
वे कमीशन का कत्था
रिश्वत का चूना लगाते हैं|
इस प्रकार देश को ही
पान समझ कर खाते हैं|
(8)
देश को, जनता को,
सबको छल रहे हैं|
नेता नहीं, वे सांप है,
आस्तीनों में पल रहे हैं|
(9)
नेता जी झूठ में
ऐसे रच गए|
सच को झूठ कहकर,
साफ़ बच गए|
(10)
नेता बाहर रहे
या जेल में,
वह पारंगत है,
सत्ता के हर खेल में|
(11)
उन्होंने गांधी टोपी पहन
अन्नागीरी क्या दिखाई|
कल तक ‘दादा’ थे,
आज बने हैं ‘भाई’|
(12)
जो कई दिनों से था
अस्पताल में पड़ा हुआ|
खर्च का बिल देखते ही
भाग खड़ा हुआ|
(13)
क्या छोटे हैं,
और क्या बड़े हैं|
सभी यहाँ बिकने को
तैयार खड़े हैं|
(14)
झूठ जाने क्या-क्या
सरेआम कहता रहा|
और सिर झुका कर सच
चुपचाप सहता रहा|

‘अनुकृति’, 706, सेक्टर-13
हिसार (हरि०)
फोन-01662-238720




31 दिसंबर 2011

नए वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ....


मीठे सुरों के साज़ के सुरताल की तरह।
तेरे हसीन ख्वाब के महिवाल की तरह।
दिल में मोहब्बतों का उजाला लिए हुए-
मैं आ रहा हुँ दोस्त! नए साल की तरह॥
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सद्भावी-डॉ० सुरेश उजाला

25 अक्टूबर 2011

ज्योति-पर्व हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...........


                                      - डॉ० डंडा लखनवी

मोटे -- मोटे रैट हों, जिस -------बंगले  के पास।
गण-पति जी का समझिए, उसमें आज
निवास॥1
 
लक्ष्मी  वाहन  को  कभी,  कहिए  नहीं उलूक।
वे रखते पिस्तौल अरु,  रायफलें ------ बंदूक़॥2


लक्ष्मी जी का वाहन = उलूक, उल्लू, आधुनिक वाहन और ड्राइवर हाईटेक हैं.                                               गणपति जी का वाहन = चूहा, आधुनिक वाहन और ड्राइवर हाईटेक हैं.

09 अक्टूबर 2011

बोध-बिहार


               

     

     
-डॉ० डंडा लखनवी

 



क्रोध -बोध  के बीच  में, चलता  सतत विरोध।
बोध-नाश पर क्रोध हो, क्रोध-विजय पर बोध॥

तीन  बुद्ध  की  ’शरण’ हैं, पाँच  बुद्ध के ’शील’।
तीन- पाँच से दुख सभी, सुख  में  हों तब्दील॥
 
'डंडा'  बोध - बिहार के, चिंतन   का  यह सार।
वधस्थलों  पर हो सकी,’अवध’  भूमि तैयार॥

पंच - शील से  जब  घटी, पंच -  मकारी  मार।
’डंडा’  तब  संसार में, चमका  अवध - बिहार॥

स्वर्ण  अक्षरों  में  मिला,  दर्ज़ा   जिसे  विशेष।
जहाँ न  वध का नाम था, वो
था अवध  प्रदेश॥

दसो  इंद्रियों  का जहाँ, बहा  सुमति   का  नीर।
गोमति का चिर अर्थ है, इंद्रिय - निग्रह   धीर॥

’डंडा’  फैजाबाद   है, अवध  -  शब्द   अनुवाद।
अवध  हमारी   संस्कृति, वध  करता  बरबाद॥

शरण= त्रिशण, शील= पंचशील, वधस्थल= बलि देनेके स्थान, पंच-मकार= मन - विचलन के पाँच आकर्षण, सुमति= अच्छा चिंतन, गोमति=चिंतन का सार, इंद्रिय-निग्रह=इंद्रियों पर नियंत्रण, धीर= धीरज, फ़ैजाबाद= आपदा मुक्त स्थान, अवध,

26 सितंबर 2011

बिल्ली का खंभा नोचना

                          
                -डॉ० डंडा लखनवी

हिंदी में एक मुहावरा है....... "बिल्ली का खंभा नोचना"। इस मुहावरे का अर्थ है कदाचार में पकड़े जाने पर कुपित होना, रोष प्रकट करना। यहाँ एक उदाहरण रख रहा हूँ। टिकट-विंडो पर लम्बी लाइन लगी होती है। एक व्यक्ति आता है और लाइन में लगे हुए लोगों को धकिया कर हाथ टिकट-विंडो में डाल देता है। यदि लोग आपत्ति करते हैं तो बहाने बनाता है। किसी तरह से जब टिकट लेकर दूर खड़े अपने साथियों के पास पहुंचता है तो चकमा दे कर जल्दी टिकट पाने पर इतराता है। कदाचार का यह एक उदाहरण मात्र है। कदाचारी के पास बहुत से बहाने होते हैं। उसकी हरकतें पर जब पकड़ी जाती हैं तो उसकी दशा 'बिल्ली का खंभा नोचने वाली' हो जाती है। ऐसी हरकतें  करने वाले विदेशी नहीं देशी लोग हैं, नेता ही नहीं, जनता भी है।

19 सितंबर 2011

सपने अति रंगीन.........


                                     -डॉ० डंडा लखनवी

राजनीति  के  घाट  पर, अभिनय  का   बाज़ार।
मिला डस्टबिन में पड़ा, जनसेवा  उपकार॥1                         

जब  से    नेता    दे  रहे, अभिनेता     को  मंच।
आमजनों को मिल रहे, तब से फिल्मी -  पंच॥2

फैशन - हिंसा - काम -छल, दें  टीवी - चलचित्र।
इन  सब  में  बाजार  है, इसमें    कहाँ   चरित्र?3

टीवी   ने  सबको    दिए, सपने     अति   रंगीन।
बदले   में  उसने  लिया, सामाजिकता   छीन॥4

न्यूज़  चैनलों  पर   ख़बर, लो   दे    रहीं   बटेर।
शाकाहारी    बनेंगे   अब, जंगल     के     शेर॥5

क्या  परोसतीं  देखिए,  लोक  लुभावन  फिल्म।
अदब  हो गया बेअदब, घिसा - पिटा सा इल्म॥6

’डंडा’  अब  चलचित्र  की, महिमा  बड़ी  विचित्र।
दावा युग - निर्माण   का, बिगड़ा  और  चरित्र॥7

जब  तक  फिल्में  रहेंगी,  युग - यर्थाथ   से दूर।
फैलेगा  तब   तक  नहीं, नैतिकता   का    नूर॥8

केवल  धन - धंधा   नहीं, फिल्मों  का  निर्माण।
उज्ज्वल  लोकाचार   हैं, इसके  असली   प्राण॥9